<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223</id><updated>2011-12-30T01:22:22.419-08:00</updated><category term='आतंकवादी बंदूक सृजन रामदेव सियासत  राजनीति'/><category term='धन्यवाद पूनम'/><category term='बापू नंदीगाम कविता वाम'/><category term='मंटो टोबा टेक सिंह मुसलमान भारत पाक पागल हिंदू-सिख'/><category term='चाय की दुकान बेकार और आवारा झुंड में'/><category term='न्यूज चैनल एलियंस'/><title type='text'>चायघर</title><subtitle type='html'>विचारों की चुस्की...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>29</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-653505851491420973</id><published>2009-01-26T10:08:00.000-08:00</published><updated>2009-01-26T10:12:04.286-08:00</updated><title type='text'>कैसे गाऊं जन गण मन</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;नवभारत टाइम्स की वेब साइट पर यह खबर देखकर मैं सिहर उठा। यह खबर ही अपने आप में एक सवाल है आप भी यह खबर पढे़&lt;br /&gt;मां ही बनी 'कंस', बच्ची को पटक-पटक कर मार डाला&lt;br /&gt;मुंबई।। मुंबई में एक महिला ने अपनी बच्ची को पैदा होते ही पटक-पटक कर मार डाला और फिर शव को पॉलिथिन बैग  में बंद कर कूड़ेदान में फेंक दिया। इस दिल दहला देने वाली वारदात को अंजाम देने में उसकी मां, बहन और भाई ने भी मदद की। महिला ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है। उसने बताया कि बच्ची के पिता ने उससे शादी से इनकार कर दिया था। घरवालों के दबाव में उसने इस वारदात को अंजाम दिया।&lt;br /&gt;भायंदर स्थित प्रतीक बिल्डिंग में रहने वाली शेफाली सेठ (28) ने 15 जनवरी को घर पर ही एक बच्ची को जन्म दिया था। डिलिवरी बाथरूम में कराई गई। इसमें उसकी मां, बहन और भाई ने मदद की। बच्ची अभी ठीक से सांस भी नहीं ले पाई थी कि शेफाली ने बच्ची के सिर को बाथरूम की दीवार से दे मारा। इससे बच्ची की तुरंत मौत हो गई।&lt;br /&gt;इसके बाद पूरे परिवार ने बच्ची को एक पॉलिथिन बैग में बंद किया और उसे खिड़की से सड़क के किनारे कूड़ेदान में फेंक दिया। दूसरे दिन जब कूड़ेवाले ने पॉलिथिन में बच्ची के शव को देखा, तो उसके होश उड़ गए। उसने तुरंत इसकी सूचना पुलिस को दी। पुलिस ने जांच के बाद शेफाली को गिरफ्तार कर लिया।&lt;br /&gt;मीरा रोड पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर मुकुंद महाजन ने बताया कि पोस्टमार्ट रिपोर्ट में भी इस बात की पुष्टि हुई है कि बच्ची की मौत सिर पर गंभीर चोट लगने के कारण हुई है। शेफाली ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है। उसके खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया है। शेफाली ने बताया कि बच्ची के पिता ने प्रेगनंट होने के बाद उससे शादी का वादा किया था। छह महीने बाद वह इससे मुकर गया। शेफाली ने बताया कि इसके बाद उसके परिवार वाले उसे घर से बाहर निकालने के लिए धमकाने लगे। शेफाली के घरवाले बच्चे को स्वीकार करने के लिए राजी नहीं थे। शेफाली ने बच्ची के पिता का नाम बताने से इनकार कर दिया है। पुलिस के मुताबिक बच्ची का पिता शेफाली का ही कोई सहकर्मी हो सकता है। शायद आप भी खबर पढ़कर मेरी ही तरह आवाक हो गए होंगे। पर मां को कंस कहने से पहले इस सवाल पर विचार करना जरुरी हो जाता है कि इस घटना का असली दोषी कौन है वह महिला उसके परिवार के लोग उसका प्रेमी या पूरा समाज। एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते आप इस सवाल का उत्तर जरूर तलाश करेंगे। उत्तर मिल सके तो मुझे भी बताएं। &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-653505851491420973?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/653505851491420973/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=653505851491420973&amp;isPopup=true' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/653505851491420973'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/653505851491420973'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2009/01/blog-post_26.html' title='कैसे गाऊं जन गण मन'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-4657877256458324779</id><published>2009-01-13T08:33:00.000-08:00</published><updated>2009-01-13T08:36:59.540-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मंटो टोबा टेक सिंह मुसलमान भारत पाक पागल हिंदू-सिख'/><title type='text'>सआदत हसन मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह</title><content type='html'>भारत पाक संबंधों को लेकर जिस तरह माहौल बन रहा है उसमें मंटो याद आए और याद आयी उनकी कहानी टोबा टेक सिंह आप भी पढें यह कहानी-----&lt;br /&gt;मालूम नहीं, यह बात माक़ूल थी या ग़ैर माक़ूल, बहरहाल दानिशमंदों के फ़ैसले के मुताबिक़ इधर-उधर ऊँची सतह की कान्फ्रेंसें हुईं और बिलआख़िर पागलों के तबादले के लिए एक दिन मुक़र्रर हो गया.&lt;br /&gt;अच्छी तरह छानबीन की गई- वे मुसलमान पागल जिनके लवाहिक़ीन हिंदुस्तान ही में थे, वहीं रहने दिए गए; जितने हिंदू-सिख पागल थे, सबके-सब पुलिस की हिफाज़त में बॉर्डर पह पहुंचा दिए गए.&lt;br /&gt;उधर का मालूम नहीं लेकिन इधर लाहौर के पागलख़ाने में जब इस तबादले की ख़बर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चिमेगोइयाँ (गपशप) होने लगीं.&lt;br /&gt;एक मुसलमान पागल जो 12 बरस से, हर रोज़, बाक़ायदगी के साथ “ज़मींदार” पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा: “मौलबी साब, यह पाकिस्तान क्या होता है...?” तो उसने बड़े ग़ौरो-फ़िक़्र के बाद जवाब दिया: “हिंदुस्तान में एक ऐसी जगह है जहाँ उस्तरे बनते हैं...!” यह जवाब सुनकर उसका दोस्त मुतमइन हो गया.&lt;br /&gt;इसी तरह एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा: “सरदार जी, हमें हिंदुस्तान क्यों भेजा जा रहा है... हमें तो वहाँ की बोली नहीं आती...” दूसरा मुस्कराया; “मुझे तो हिंदुस्तोड़ों की बोली आती है, हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ आकड़ फिरते हैं...”&lt;br /&gt;एक दिन, नहाते-नहाते, एक मुसलमान पागल ने “पाकिस्तान: जिंदाबाद” का नारा इस ज़ोर से बुलंद किया कि फ़र्श पर फिसलकर गिरा और बेहोश हो गया.&lt;br /&gt;बाज़ पागल ऐसे भी थे जो पागल नहीं थे; उनमें अक्सरीयत (बहुतायत) ऐसे क़ातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफ़सरों को कुछ दे दिलाकर पागलख़ाने भिजवा दिया था कि वह फाँसी के फंदे से बच जाएँ; यह पागल कुछ-कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान क्यों तक़्सीम हुआ है और यह पाकिस्तान क्या है; लेकिन सही वाक़िआत से वह भी बेख़बर थे; अख़बारों से उन्हें कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे, जिनकी गुफ़्तुगू से भी वह कोई नतीजा बरामद नहीं कर सकते थे. उनको सिर्फ़ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्नाह है: जिसको क़ायदे-आज़म कहते हैं; उसने मुसलमानों के लिए एक अलहदा मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्तान है; यह कहाँ है, इसका महल्ले-वुक़ू (भौगोलिक स्थिति) क्या है, इसके मुताल्लिक़ वह कुछ नहीं जानते थे- यही वजह है कि वह सब पागल जिनका दिमाग़ पूरी तरह माऊफ़ नहीं हुआ था, इस मख़मसे में गिरफ़्तार थे कि वह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में; अगर हिंदुस्तान में है तो पाकिस्तान कहाँ है; अगर पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि वह कुछ अर्से पहले यहीं रहते हुए हिंदुस्तान में थे.&lt;br /&gt;  एक पागल तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान, पाकिस्तान और हिंदुस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ़्तार हुआ कि और ज़्यादा पागल हो गया. झाड़ू देते-देते वह एक दिन दरख़्त पर चढ़ गया और टहने पर बैठकर दो घंटे मुसलसल तक़रीर करता रहा, जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान के नाज़ुक मसले पर थी... सिपाहियों ने जब उसे नीचे उतरने को कहा तो वह और ऊपर चढ़ गया. जब उसे डराया-धमकाया गया तो उसने कहा: “मैं हिंदुस्तान में रहना चाहता हूं न पाकिस्तान में... मैं इस दरख़्त ही पर रहूंगा...” बड़ी देर के बाद जब उसका दौरा सर्द पड़ा तो वह नीचे उतरा और अपने हिंदू-सिख दोस्तों से गले मिलकर रोने लगा- उस ख्याल से उसका दिल भर आया था कि वह उसे छोड़कर हिंदुस्तान चले जाएँगे...&lt;br /&gt;एक एमएससी पास रेडियो इंजीनियर में, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिलकुल अलग-थलग बाग़ की एक ख़ास रविश पर सारा दिन ख़ामोश टहलता रहता था, यह तब्दीली नुमूदार हुई कि उसने अपने तमाम कपड़े उतारकर दफ़ेदार के हवाले कर दिए और नंग-धड़ंग सारे बाग़ में चलना-फिरना शुरू कर दिया.&lt;br /&gt;चियौट के एक मोटे मुसलमान ने, जो मुस्लिम लीग का सरगर्म कारकुन रह चुका था और दिन में 15-16 मर्तबा नहाया करता था, यकलख़्त यह आदत तर्क कर दी उसका नाम मुहम्मद अली था, चुनांचे उसने एक दिन अपने जंगल में एलान कर दिया कि वह क़ायदे-आज़म मुहम्मद अली जिन्नाह है; उसकी देखा-देखी एक सिख पागल मास्टर तारा सिंह बन गया- इससे पहले कि ख़ून-ख़राबा हो जाए, दोनों को ख़तरनाक पागल क़रार देकर अलहदा-अलहदा बंद कर दिया गया.&lt;br /&gt;लाहौर का एक नौजवान हिंदू पकील मुहब्बत में नाकाम होकर पागल हो गया; जब उसने सुना कि अमृतसर हिंदुस्तान में चला गया है तो बहुत दुखी हुआ. अमृतसर की एक हिंदू लड़की से उसे मुहब्बत थी जिसने उसे ठुकरा दिया था मगर दीवानगी की हालत में भी वह उस लड़की को नहीं भूला था-वह उन तमाम हिंदू और मुसलमान लीडरों को गालियाँ देने लगा जिन्होंने मिल-मिलाकर हिंदुस्तान के दो टुकड़े कर दिए हैं, और उनकी महबूबा हिंदुस्तानी बन गई है और वह पाकिस्तानी…जब तबादले की बात शुरू हुई तो उस वकील को कई पागलों ने समझया कि दिल बुरा न करे… उसे हिंदुस्तान भेज दिया जाएगा, उसी हिंदुस्तान में जहाँ उसकी महबूबा रहती है- मगर वह लाहौर छोड़ना नहीं चाहता था; उसका ख़याल था कि अमृतसर में उसकी प्रैक्टिस नहीं चलेगी.&lt;br /&gt;योरोपियन वार्ड मं दो एंग्लो इंडियन पागल थे. उनको जब मालूम हुआ कि हिंदुस्तान को आज़ाद करके अंग्रेज़ चले गए हैं तो उनको बहुत सदमा हुआ; वह छुप-छुपकर घंटों आपस में इस अहम मसले पर गुफ़्तुगू करते रहते कि पागलख़ाने में अब उनकी हैसियत किस क़िस्म की होगी; योरोपियन वार्ड रहेगा या उड़ा दिया जाएगा; ब्रेक-फ़ास्ट मिला करेगा या नहीं; क्या उन्हें डबल रोटी के बजाय ब्लडी इंडियन चपाटी तो ज़हर मार नहीं करनी पड़ेगी?&lt;br /&gt;।।।।।।।।।&lt;br /&gt;एक सिख था, जिसे पागलख़ाने में दाख़िल हुए 15 बरस हो चुके थे. हर वक़्त उसकी ज़ुबान से यह अजीबो-ग़रीब अल्फ़ाज़ सुनने में आते थे : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन…” वह दिन को सोता था न रात को.&lt;br /&gt;पहरेदारों का यह कहना था कि 15 बरस के तलीव अर्से में वह लहज़े के लिए भी नहीं सोया था; वह लेटता भी नहीं था, अलबत्ता कभी-कभी दीवार के साथ टेक लगा लेता था- हर वक़्त खड़ा रहने से उसके पाँव सूज गए थे और पिंडलियाँ भी फूल गई थीं, मगर जिस्मानी तकलीफ़ के बावजूद वह लेटकर आराम नहीं करता था.&lt;br /&gt;हिंदुस्तान, पाकिस्तान और पागलों के तबादले के मुताल्लिक़ जब कभी पागलख़ाने में गुफ़्तुगू होती थी तो वह ग़ौर से सुनता था; कोई उससे पूछता कि उसका क्या ख़याल़ है तो वह बड़ी संजीदगी से जवाब देता : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट…! ” लेकिन बाद में “आफ़ दि पाकिस्तान गवर्नमेंट ” की जगह “आफ़ दि टोबा सिंह गवर्नमेंट!” ने ले ली, और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू कर दिया कि टोबा टेक सिंह कहाँ है, जहाँ का वह रहने वाला है. किसी को भी मालूम नहीं था कि टोबा सिंह पाकिस्तान में है... या हिंदुस्तान में; जो बताने की कोशिश करते थे वह ख़ुद इस उलझाव में गिरफ़्तार हो जाते थे कि सियालकोट पहले हिंदुस्तान में होता था, पर अब सुना है पाकिस्तान में है. क्या पता है कि लाहौर जो आज पाकिस्तान में है... कल हिंदुस्तान में चला जाए... या सारा हिंदुस्तान ही पाकिस्तान बन जाए... और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान, दोनों किसी दिन सिरे से ग़ायब ही हो जाएँ...!&lt;br /&gt;इस सिख पागल के केश छिदरे होकर बहुत मुख़्तसर रह गए थे; चूंकि बहुत कम नहाता था, इसलिए दाढ़ी और सिर के बाल आपस में जम गए थे. जिसके बायस उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गई थी; मगर आदमी बे-ज़रर था. 15 बरसों में उसने कभी किसी से झगड़ा-फसाद नहीं किया था. पागलख़ाने के जो पुराने मुलाज़िम थे, वह उसके मुताल्लिक़ इतना जानते थे कि टोबा टेक सिंह में उसकी कई ज़मीनें थीं; अच्छा खाता-पीता ज़मींदार था कि अचानक दिमाग़ उलट गया, उसके रिश्तेदार उसे लोहे की मोटी-मोटी ज़ंजीरों में बाँधकर लाए और पागलख़ाने में दाख़िल करा गए.&lt;br /&gt;महीने में एक मुलाक़ात के लिए यह लोग आते थे और उसकी ख़ैर-ख़ैरियत दरयाफ़्त करके चले जाते थे; एक मुद्दत तक यह सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान, हिंदुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उसका आना-जाना बंद हो गया.&lt;br /&gt;उसका नाम बिशन सिंह था मगर सब उसे टोबा टेक सिंह कहते थे. उसको यह क़त्अन मालूम नहीं था कि दिन कौन सा है, महीना कौन सा है या कितने साल बीत चुके हैं; लेकिन हर महीने जब उसके अज़ीज़ो-अकारिब उससे मिलने के लिए आने के क़रीब होते तो उसे अपने आप पता चल जाता; उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर ख़ूब साबुन घिसता और बालों में तेल डालकर कंघा करता; अपने वह कपड़े जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवाकर पहनता और यूँ सज-बनकर मिलने वालों के पास जाता. वह उससे कुछ पूछते तो वह ख़ामोश रहता या कभी-कभार “औपड़ दि गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन...” कह देता.&lt;br /&gt;उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक ऊँगली बढ़ती-बढ़ती 15 बरसों में जवान हो गई थी. बिशन सिंह उसको पहचानता ही नहीं था-वह बच्ची थी जब भी अपने बाप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आँखों से आँसू बहते थे.&lt;br /&gt;पाकिस्तान और हिंदुस्तान का क़िस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेक सिंह कहाँ है; जब उसे इत्मीनानबख़्श जवाब न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब-दिन बढ़ती गई. अब मुलाक़ात भी नहीं आती थी; पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलनेवाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज़ भी बंद हो गई थी जो उनकी आमद की ख़बर दे दिया करती थी-उसकी बड़ी ख़्वाहिश थी कि वह लोग आएँ जो उससे हमदर्दी का इज़हार करते थे और उसके लिए फल, मिठाइयाँ और कपड़े लाते थे. वह आएँ तो वह उनके पूछे कि टोबा टेक सिंह कहाँ है... वह उसे यक़ीनन बता देंगे कि टोबा टेक सिंह वहीं से आते हैं जहाँ उसकी ज़मीनें हैं.&lt;br /&gt;पागलख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो ख़ुद को ख़ुदा कहता था. उससे जब एक रोज़ बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेक सिंह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में तो उसने हस्बे-आदत क़हक़हा लगाया और कहा : “वह पाकिस्तान में है न हिंदुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म ही नहीं दिया...!”&lt;br /&gt;बिशन सिंह ने उस ख़ुदा से कई मर्तबा बड़ी मिन्नत-समाजत से कहा कि वह हुक्कम दे दे ताकि झंझट ख़त्म हो, मगर ख़ुदा बहुत मसरूफ़ था, इसलिए कि उसे और बे-शुमार हुक्म देने थे.&lt;br /&gt;एक दिन तंग आकर बिशन सिंह ख़ुदा पर बरस पड़ा: “ औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ वाहे गुरु जी दा ख़ालसा एंड वाहे गुरु जी दि फ़तह...!” इसका शायद मतलब था कि तुम मुसलमानों के ख़ुदा हो, सिखों के ख़ुदा होते तो ज़रूर मेरी सुनते.&lt;br /&gt;तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेक सिंह का एक मुसलमान जो बिशन सिंह का दोस्त था, मुलाक़ात के लिए आया; मुसलमान दोस्त पहले कभी नहीं आया था. जब बिशन सिंह ने उसे देखा तो एक तरफ़ हट गया, फिर वापिस जाने लगा मगर सिपाहियों ने उसे रोका: “यह तुमसे मिलने आया है...तुम्हारा दोस्त फ़ज़लदीन है...!”&lt;br /&gt;बिशन सिंह ने फ़ज़लदीन को एक नज़र देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा.&lt;br /&gt;बिशन सिंह ने फ़ज़लदीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा : “मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूँ लेकिन फ़ुरसत ही न मिली... तुम्हारे सब आदमी ख़ैरियत से हिंदुस्तान चले गए थे... मुझसे जितनी मदद हो सकी, मैंने की... तुम्हारी बेटी रूपकौर...” वह कहते-कहते रुक गया.&lt;br /&gt;बिशन सिंह कुछ याद करने लगा : “बेटी रूपकौर...”&lt;br /&gt;फ़ज़लदीन ने फिर कहना शुरू किया : उन्होंने मुझे कहा था कि तुम्हारी ख़ैर-ख़ैरियत पूछता रहूँ... अब मैंने सुना है कि तुम हिंदुस्तान जा रहे हो... भाई बलबीर सिंह और भाई वधावा सिंह से मेरा सलाम कहना और बहन अमृतकौर से भी... भाई बलबीर से कहना कि फ़ज़लदीन राज़ीख़ुशी है...दो भूरी भैसें जो वह छोड़ गए थे, उनमें से एक ने कट्टा दिया है... दूसरी के कट्टी हुई थी, पर वह 6 दिन की होके मर गई...और... मेरे लायक़ जो ख़िदमत हो, कहना, मैं वक़्त तैयार हूँ... और यह तुम्हारे लिए थोड़े-से मरोंडे लाया हूँ...!”&lt;br /&gt;बिशन सिंह ने मरोंडों की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फ़ज़लदीन से पूछा : “टोबा टेक सिंह कहाँ है...”&lt;br /&gt;फ़ज़लदीन ने क़दरे हैरत से कहा : “कहाँ है... वहीं है, जहाँ था!”&lt;br /&gt;बिशन सिंह ने फिर पूछा : “पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में...”&lt;br /&gt;“हिंदुस्तान में... नहीं, नहीं पाकिस्तान में...! ” फ़ज़लदीन बौखला-सा गया. बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान एंड हिंदुस्तान आफ़ दी दुर फ़िटे मुँह...! ”&lt;br /&gt;।।।।।।।।।।&lt;br /&gt;तबादले की तैयारियाँ मुकम्मल हो चुकी थीं, इधर से उधर और उधर से इधर आनेवाले पागलों की फ़ेहरिस्तें पहुँच चुकी थीं और तबादले का दिन भी मुक़र्रर हो चुका था.&lt;br /&gt;सख़्त सर्दियाँ थीं जब लाहौर के पागलख़ाने से हिंदू-सिख पागलों से भरी हुई लारियाँ पुलिस के मुहाफ़िज़ दस्ते के साथ रवाना हुई, मुताल्लिक़ा अफ़सर भी हमराह थे. वागह के बौर्डर पर तरफ़ैन के सुपरिटेंडेंट एक-दूसरे से मिले और इब्तिदाई कार्रवाई ख़त्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया, जो रात भर जारी रहा.&lt;br /&gt;  पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे, मगर उसने चलने से इनकार कर दिया : “टोबा टेक सिंह यहाँ है..! ” और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी टोबा टेक सिंह एंड पाकिस्तान...! ”&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफ़सरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था; बाज़ तो बाहर निकलते ही नहीं थे, जो निकलने पर रज़ामंद होते थे, उनको संभालना मुश्किल हो जाता था, क्योंकि उन्हें फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते-कोई गालियाँ बक रहा है... कोई गा रहा है... कुछ आपस में झगड़ रहे हैं... कुछ रो रहे हैं, बिलख रहे हैं-कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती थी- पागल औरतों का शोरो-ग़ोग़ा अलग था, और सर्दी इतनी कड़ाके की थी कि दाँत से दाँत बज रहे थे.&lt;br /&gt;पागलों की अक्सरीयत इस तबादले के हक़ में नहीं थी, इसलिए कि उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें अपनी जगह से उख़ाड़कर कहाँ फेंका जा रहा है; वह चंद जो कुछ सोच-समझ सकते थे, “पाकिस्तान : ज़िंदाबाद” और “पाकिस्तान : मुर्दाबाद” के नारे लगा रहे थे ; दो-तीन मर्तबा फ़साद होते-होते बचा, क्योंकि बाज़ मुसलमानों और सिखों को यह नारे सुनकर तैश आ गया था.&lt;br /&gt;जब बिशन सिंह की बारी आई और वागन के उस पार का मुताल्लिक़ अफ़सर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा : “टोबा टेक सिंह कहाँ है... पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में.... ?”&lt;br /&gt;मुताल्लिक़ा अफ़सर हँसा : “पाकिस्तान में...! ”&lt;br /&gt;यह सुनकर बिशन सिंह उछलकर एक तरफ़ हटा और दौड़कर अपने बाक़ीमादा साथियों के पास पहुंच गया.&lt;br /&gt;पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे, मगर उसने चलने से इनकार कर दिया : “टोबा टेक सिंह यहाँ है..! ” और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी टोबा टेक सिंह एंड पाकिस्तान...! ”&lt;br /&gt;उसे बहुत समझाया गया कि देखो, अब टोबा टेक सिंह हिंदुस्तान में चला गया... अगर नहीं गया है तो उसे फ़ौरन वहाँ भेज दिया जाएगा, मगर वह न माना! जब उसको जबर्दस्ती दूसरी तरफ़ ले जाने की कोशिश की गई तो वह दरमियान में एक जगह इस अंदाज़ में अपनी सूजी हुई टाँगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे कोई ताक़त नहीं हिला सकेगी... आदमी चूंकि बे-ज़रर था, इसलिए उससे मज़ीद ज़बर्दस्ती न की गई ; उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया, और तबादले का बाक़ी काम होता रहा.&lt;br /&gt;सूरज निकलने से पहले साकितो-सामित (बिना हिलेडुले खड़े) बिशन सिंह के हलक़ के एक फ़लक शिगाफ़(गगनभेदी) चीख़ निकली.&lt;br /&gt;इधर-उधर से कई अफ़सर दौड़े आए और उन्होंने देखा कि वह आदमी जो 15 बरस तक दिन-रात अपनी दाँगों पर खड़ा रहा था, औंधे मुँह लेटा है-उधर ख़ारदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान ; दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था.&lt;br /&gt;(राजकमल प्रकाशन के संग्रह 'दस्तावेज़' से साभार)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-4657877256458324779?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/4657877256458324779/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=4657877256458324779&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/4657877256458324779'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/4657877256458324779'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2009/01/blog-post_13.html' title='सआदत हसन मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-5194151001400796171</id><published>2009-01-08T11:42:00.000-08:00</published><updated>2009-01-09T04:54:27.824-08:00</updated><title type='text'>चाल चेहरा चरित्र</title><content type='html'>तीन-चार घटनाओं के बारे में बात करना चाहता हूं। ये घटनाएं हमारे समाज सरकार और राजनीति के उजले-काले पहलुओं से हमें परिचित कराती हैं। इन घटनाओं के बारे में आपने पहले भी सुना होगा पर एक बार दोहराना जरूरी समझता हूं ताकि सनद रहे-&lt;br /&gt;चालः धन-संगह के लिए दिल्ली में सरकार एमसीडी के पन्द्रह प्राइमरी स्कूलों को नीलाम करने जा रही है। इन स्कूलों की जमीन पर माल और दुकानें बनाई जाएंगी। सरकार की योजना कुल साठ स्कूलों के कैंपस को नीलाम करने की है।&lt;br /&gt;यह हालत तब है जब दिल्ली में तीन से पांच लाख बच्चे स्कूल से वंचित हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चेहराः शांति सुदराजन शायद यह नाम आपके जेहन में अब नहीं होगा। ईट भटठा पर काम करने वाले माता-पिता की इस संतान ने दोहा एशियन गेम में सिल्वर मेडल जीता था। पर लिंग परीक्षण में असफल हो गई। अपमान का घूंट पीने से बेहतर मर जाना है यह सोचकर नौ महीने बाद उसने एक दिन आत्महत्या की कोशिश की पर बचा ली गई। अब सदमे से उबर कर वह फिर ट्रैक पर लौट आई है। इस बार खिलाड़ी नहीं प्रशिक्षक के तौर पर। उसने ओलंपियन स्पोर्ट्स एकेडेमी खोली है। और जुट गई है नए चैंपियन तैयार करने में‌।&lt;br /&gt;क्या आपने ये खबर सुनी है। अगर हां तो जरूर आपने उसके जज्बे को सलाम किया होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;चरित्रः दिल्ली बीजेपी आफिस में किसी ने दो करोड़ साठ लाख रुपये चुरा लिए। लगता है पार्टी ने तिजोरी की चाभी ही किसी चोर को सौंप रखी थी। राजनाथ सहित सारे लोग मामले को दबाने की कोशिश में लगे हैं। अंदर ही अंदर मामले का पता लगाने के लिए निजी जासूस की मदद ली जा रही है।&lt;br /&gt;देश चलाने का दावा करती है यह पार्टी। जरा सोचिए अगर इनके हाथ में देश की तिजोरी हो तो क्या होगा&lt;br /&gt;नोएडा में एक लड़की के साथ किकेट खेल कर आ रही टीम ने बलात्कार किया।&lt;br /&gt;शर्म है वे इसी समाज के हिस्से हैं।&lt;br /&gt;आतंकी हमले के अलावा भी देश पर अनेक संकट हैं क्या नहीं हैं&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-5194151001400796171?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/5194151001400796171/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=5194151001400796171&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/5194151001400796171'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/5194151001400796171'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='चाल चेहरा चरित्र'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-1592109136385427224</id><published>2008-12-23T09:55:00.000-08:00</published><updated>2008-12-25T05:05:00.347-08:00</updated><title type='text'>बुश बुरा नहीं मानते</title><content type='html'>जब मुंतजिर जैदी ने इराकी जनता और वहां की विधवाओं की ओर से बुश पर तान कर जूते फेंके तो वह क्षण एक इतिहास में बदल गया । जब कभी  भी खुद को महामहिम समझने वाले किसी ताकतवर देश का मदांध शासक किसी कमजोर देश को अपने पैरों तले कुचलने की कोशिश करेगा उसे मुंतजिर के जूते सपने में जरुर नजर आएंगे । बुश पर जूता फेंकने की घटना पर चर्चित कवि राधेश्याम तिवारी ने अपनी कविता पढ़ने के लिए दी। यह कविता आप भी पढ़िए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग बेवजह शंकित हैं&lt;br /&gt;कि टाटा चाय की तरह&lt;br /&gt;बुश बहुत कड़क हैं&lt;br /&gt;न जाने वे किस बात का बुरा मान जाएं&lt;br /&gt;जबकि बुश किसी बात का बुरा नहीं मानते&lt;br /&gt;इराकी पत्रकार&lt;br /&gt;मंतदार अल जैदी के&lt;br /&gt;जूते मारने का&lt;br /&gt;बुरा नहीं माना उन्होंने&lt;br /&gt;जैदी के दो जूते उन पर पड़े&lt;br /&gt;एक इराकी जनता की ओर से&lt;br /&gt;दूसरा वहां की विधवाओं की ओर से&lt;br /&gt;अपनी ओर से तो अभी&lt;br /&gt;बाकी ही है जूता मारना&lt;br /&gt;बुश ने फिर भी&lt;br /&gt;मुस्कराते हुए कहा-&lt;br /&gt;इसे मैं बुरा नहीं मानता&lt;br /&gt;यह स्वतंत्र समाज का संकेत है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुश का समाज&lt;br /&gt;बहुत पहले से स्वतंत्र हो चुका है&lt;br /&gt;जिसका इस्तेमाल कर उनके देश ने&lt;br /&gt;दुनियाभर में बम बरसाए हैं&lt;br /&gt;और बेशुमार खून बहाया&lt;br /&gt;अगर कोई उनकी स्वतंत्रता को बुरा&lt;br /&gt;बुरा मानता है तो&lt;br /&gt;इसमें बुश का क्या दोष&lt;br /&gt;लेकिन बुरा मानकर भी&lt;br /&gt;वे जैदी का क्या कर लेंगे&lt;br /&gt;समय जो इतिहास में&lt;br /&gt;दर्ज हो चुका है&lt;br /&gt;उसे वे सद्दाम की तरह&lt;br /&gt;फांसी पर तो चढ़ा नहीं सकते&lt;br /&gt;और न ही फिलिस्तीनी जनता की तरह&lt;br /&gt;उसे इतिहास के पन्नों से&lt;br /&gt;दर-ब-दर कर सकते हैं&lt;br /&gt;कुछ भी कर के वे उस समय को&lt;br /&gt;कैसे भूल सकते हैं&lt;br /&gt;जिस समय उन्हें जूते पड़े थे&lt;br /&gt;बहुत करेंगे तो जैदी का&lt;br /&gt;कीमा बनाकर&lt;br /&gt;अपने प्यारे कुत्तों में बांट देंगे&lt;br /&gt;मंदी के इस दौर में&lt;br /&gt;उन्हें इसकी जरुरत भी है&lt;br /&gt;लेकिन डर है कि इससे तो जैदी&lt;br /&gt;और जिंदा हो जाएगा&lt;br /&gt;और लोग समझने लगेंगे कि&lt;br /&gt;बुश सचमुच बुरा मान गए&lt;br /&gt;जिससे जैदी अपने मकसद में&lt;br /&gt;कामयाब हो जाएगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुश यह जानते हैं&lt;br /&gt;कि आतंक का विरोध करके मरना&lt;br /&gt;आतंक सहकर जिंदा रहने से&lt;br /&gt;अधिक कीमती है&lt;br /&gt;इसलिए जूते मारने का वे&lt;br /&gt;कभी बुरा नहीं मानेंगे&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-1592109136385427224?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/1592109136385427224/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=1592109136385427224&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/1592109136385427224'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/1592109136385427224'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/12/blog-post_23.html' title='बुश बुरा नहीं मानते'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-6636622083944507641</id><published>2008-12-19T09:54:00.000-08:00</published><updated>2008-12-19T10:49:29.955-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आतंकवादी बंदूक सृजन रामदेव सियासत  राजनीति'/><title type='text'>सृजन को बंदूक चाहिए</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;सृजन मेरे भांजे का नाम है । गोरखपुर में रहता है । उम्र लगभग तीन साल । ठीक से बोलना नहीं आता । लेकिन जब भी फोन पर बात होती है मुझसे कुछ न कुछ फरमाइश जरुर करता है । कभी कपड़े खिलौने चश्मा घड़ी आदि । पिछले कुछ दिनों से उसके मांगपत्र में एक नई चीज जुड़ गई है--बंदूक । जब पहली बार उसने बंदूक की मांग की तो मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया । लेकिन जब दूसरी-तीसरी बार उसने बंदूक का नाम लिया तो मैंने पूछ ही लिया कि वह बंदूक का क्या करेगा । उसने कहा आतंकवादियों को मारुंगा । कहीं बाबा रामदेव को पढ़ा कहते हैं तिल-तिल कर मरने से अच्छा है आतंकवादियों से लड़कर मरा जाए । क्या बच्चा क्या बाबा सभी के दिलों पर मुंबई ने के आतंकी हमलों ने गहरा असर डाला है । टीवी पर हमले की सीधी कार्रवाई देखने वाले अधिकतर लोगों की यही इच्छा है । हम सभी बहुत उद्वेलित हैं कुछ कर गुजरना चाहते हैं समस्या को जड़ से उखाड़ फेंकने पर आमादा हैं पर मन में कुछ सवाल उठते हैं यह पहली बार नहीं है जब पूरे देश को शर्मसार होना पड़ा है। इससे पहले कंधार विमान अपहरण संसद पर हमला कारगिल जैसे कई कांड हो चुके हैं। सीरियल बम ब्लास्ट तो जैसे रोज की घटनाए हैं । पर यह हमारी स्मृति इतनी ‌क्षीण हो गई है कि कुछ ही दिनों के बाद हम हर घटना को भूल जाते हैं। दूसरी बात कि हर घटना पर हम इतने उन्मादी क्यों होने लगे हैं । कोई टिप्पणी पोस्टर कोई हमला राष्ट्रीय उन्माद में क्यों बदल जाता है । क्यों नेताओं की सियासत का शिकार होकर कोई बच्चा पिस्तौल लेकर बेस्ट की बस पर चढ़ जाता है । बहरहाल मुंबई हमलों के बाद अमिताभ बच्चन सिरहाने बंदूक रखकर सोए और सृजन को बंदूक की जरुरत है । क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है । क्या हम अपनी सीमाओं सेना पुलिस और गुप्तचर व्यवस्था को इतना चाक चौबंद नहीं कर सकते कि कोई परिंदा भी पर न मार सके । क्या हम विदेश नीति और कूट नीति ककहरा भी नहीं जानते । कहने को तो हम परमाणु संपन्न देश हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर हमारी आवाज अनसुनी क्यों है । क्या हम अपनी सरकार से कोई आशा करें । शायद यह मूर्खता ही होगी। अफसोस देश की गद्दी पर ऐसा प्रधानमंत्री है जिसके पास जनता की ताकत ही नहीं । एक ऐसा व्यक्ति जिसने झूठ बोल कर पूर्वोत्तर से राज्स सभा की सदस्यता ली हो और किसी की दया पर प्रधानमंत्री बन बैठा हो उसकी आवाज में वो गरिमा और ताकत नहीं आ सकती जो एक महान जनतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री में होनी चाहिए । प्रधानमंत्री को तो छोड़िए आज किस नेता में वह ओज आत्मबल नैतिकता और ईमानदारी है। शायद इसीलिए ताज के बाद हमने नेताओ को गालियां देना शुरु कर दिया । पर गालियां देने से क्या होगा जाति धर्म क्षेत्र के नाम पर हमी तो चुनते हैं उन्हे । यह हमारी ही तो सोच है कि जो कानून को धता बताकर हमारा गलत सही काम न करा सके वह नेता कैसा । हमने ही तो संसद और विधान सभाओं में अपराधियों को बिठा रखा है । गलती उनकी भी है जो कंधे उचकाकर बोल देते हैं कि राजनीति गंदी है । हम भूल जाते हैं कि दुनिया के अधिकतर मसलों का हल राजनीति से ही संभव है ।&lt;br /&gt;बहरहाल सृजन को आतंकवादियों से लड़ने के लिए बंदूक चाहिए । क्या वाकई कोई दूसरा रास्ता नहीं है । &lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-6636622083944507641?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/6636622083944507641/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=6636622083944507641&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/6636622083944507641'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/6636622083944507641'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/12/blog-post_19.html' title='सृजन को बंदूक चाहिए'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-4991638203115229100</id><published>2008-12-11T09:38:00.000-08:00</published><updated>2008-12-11T09:42:20.899-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चाय की दुकान बेकार और आवारा झुंड में'/><title type='text'>बेरोजगार लड़के</title><content type='html'>वे मिल जाएंगे कहीं भी&lt;br /&gt;झुंड में बैठे हुए&lt;br /&gt;किसी चाय की दुकान पर&lt;br /&gt;या कहीं भी उस जगह&lt;br /&gt;जहां बैठा जा सके देर तक&lt;br /&gt;अल्हड़ हवाओं की तरह&lt;br /&gt;वे हंसते हैं बेफिक्र हंसी&lt;br /&gt;बोलते-बोलते अकसर&lt;br /&gt;देखने लगते है शून्य में&lt;br /&gt;बुदबुदाते हैं&lt;br /&gt;हवाओं में टांकते हैं गालियां&lt;br /&gt;और हाथ में चाय की गिलास थामे&lt;br /&gt;बांचते रहते हैं&lt;br /&gt;गली की लड़की से लेकर&lt;br /&gt;लादेन तक की कुंडली&lt;br /&gt;उनके पास&lt;br /&gt;सूचना और अफवाहों का&lt;br /&gt;अथाह भंडार है&lt;br /&gt;वे अफवाहों की सचाई में यकीन करते हैं&lt;br /&gt;सच सी लगें अफवाहें&lt;br /&gt;इसलिए&lt;br /&gt;उनमें कुछ अफवाहें और भी जोड़ देते हैं&lt;br /&gt;उन्हें कभी भी आवाज लगाई जा सकती है&lt;br /&gt;मंगवाई जा सकती है बाजार से सब्जी&lt;br /&gt;वे जमा करा सकते हैं पानी-बिजली का बिल&lt;br /&gt;मरीज को पहुंचाना हो अस्पताल&lt;br /&gt;तो उठाया जा सकता है उन्हें आधी रात में&lt;br /&gt;वे अच्छे बच्चे हैं&lt;br /&gt;किसी काम के लिए ना नहीं करते&lt;br /&gt;ना करने पर कहा जा सकता है उन्हें&lt;br /&gt;बेकार और आवारा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-4991638203115229100?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/4991638203115229100/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=4991638203115229100&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/4991638203115229100'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/4991638203115229100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='बेरोजगार लड़के'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-4356909538075619069</id><published>2008-11-27T09:16:00.000-08:00</published><updated>2008-11-27T09:21:27.702-08:00</updated><title type='text'>श्रीराम सेंटर का बुक कार्नर बंद</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली के प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र मंडी हाउस में स्थित श्रीराम सेंट का बुक कार्नर एक सप्ताह पहले अचानक बंद कर दिया गया है । वाणी प्रकाशन के अरुण महेश्वरी ने बताया कि अर्बन डिपार्टमेंट की तरफ से श्रीराम सेंटर के ट्रस्टी को एक नोटिस दिया गया था कि किताब और पत्रिकाएं बेचना कमर्शियल एक्टिविटी है इसलिए इसे शीघ्र बंद कर दिया जाए । इसलिए बुक सेंटर बंद करने का निर्णय लिया गया है । आश्चर्य की बात है कि श्रीराम सेंटर में कैंटीन तो चलायी जा सकती है लेकिन किताबों की दुकान नहीं यानी पेट पूजा तो ठीक लेकिन दिमागी भूख शांत करने की जरुरत यह व्यवस्था महसूस नहीं करती ।  बुक कार्नर हटने से लिखने-पढ़ने वाले मायूस हैं लेकिन शायद हम स्वीकार कर चुके हैं कि दुनिया में किताबों के लिए जगह कम होती जा रही है तभी तो दिल्ली के प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र में किताबों की दुकान का बंद होना हमारे लिए कोई खबर नहीं ।&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-4356909538075619069?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/4356909538075619069/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=4356909538075619069&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/4356909538075619069'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/4356909538075619069'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/11/blog-post_27.html' title='श्रीराम सेंटर का बुक कार्नर बंद'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-7356686676365285974</id><published>2008-11-23T00:05:00.000-08:00</published><updated>2008-11-23T01:49:46.242-08:00</updated><title type='text'>काश यह मौन इतना लंबा न होता</title><content type='html'>भइया को गुजरे दो महीने से ज्यादा हुए‌‌  वे छह साल से ब्लड कैंसर से पीड़ित थे‌‌ पर कभी बेड पर नहीं रहे‌‌ जब तक जिंदा थे मजे में अपना काम-काज करते रहे‌ हमारे बीच बचपन में भाइयों के बीच होने वाले लड़ाई-झगड़े नहीं हुए‍ वे उम्र में मुझसे दस साल बड़े थे‌ शायद यह एक वजह रही हो‌ ‌ बडे भाई होने के बावजूद उन्होंने कभी बड़े भाई वाला धौंस नहीं जमाया ‌‌ पूरी जिंदगी में मुझे कोई ऐसा वाकया याद नहीं जब उन्होंने मुझे एक थप्पड़ भी मारा हो‌‌  बचपन में बस एक बार उनसे डांट पड़ी वह भी तब जब एक बार घर छोड़कर भागा था ‌ उन्होंने मुझे बस स्टेशन पर पकड़ा बाइक पर बैठाया और डांटते हुए घर तक ले आए थे‌ बचपन में मेरी शरारतों को मौन रह कर बरदाश्त कर लेते थे‌ कभी मुझे कोई नसीहत देने की कोशिश नहीं की ‌जब मैं बैडमिंटन या क्रिकेट में ईनाम पाता और घर आकर सबको दिखाता तो वे भी पास आकर मेरी बातें सुनते  और मुस्कराते पर कहते कुछ नहीं‌ ‌ वे मेरी हर शरारत को मौन रहकर बरदाश्त करते‌  हम पास बैठते तो बहुत कम मौकों पर ही सीधे-सीधे एक दूसरे से बातें करते थे‌ बारहवीं के बाद जब पढ़ाई के लिए घर छोड़ा तब से उनसे कुछ ज्यादा बातें होने लगी थीं‌ जब मैं दिल्ली या इलाहाबाद से घर जाता तो वे अपने चैंबर में बैठे फाइलें निबटा रहे होते थे‌ मैं पास जाता पैर छूता मुझे देखकर वे सिर्फ इतना भर कहते-अरे आ गए‌ फिर पंद्रह बीस मिनट बाद घर के अंदर आते पास बैठते न कुछ कहते और न ही कुछ पूछते‌ बस मेरी बातें सुनते रहते‌  ऐसा नहीं कि वह बातें नहीं करते थे‌ बाबूजी से उनकी खूब बातें होती थीं‌ बाहर बारामदे में पड़ी चेयर पर बैठकर घंटों बातें करते ‌कभी-कभी अम्मा परेशान हो जातीं‌ कहतीं कि जैसे बाप-बेटे के पास गप्पें मारने के सिवाय कोई दूसरा काम ही नहीं है‌‌ ‌ आज जब भइया नहीं हैं अम्मा-बाबूजी आधी रात में कभी-कभी भोर में उठकर बाहर बारामदे में पड़ी चेयर पर घंटों गुमसुम बैठे रहते हैं उन्हें यादकर रोते रहते हैं‍&lt;br /&gt;अगली बार जब घर जाऊंगा तो  भइया कहीं नजर नहीं आएंगे ‌ अपने चेंबर में‌ भी नहीं ‌ आज दिल में कसक सी उठती है काश वे पास होते तो उनसे खूब बातें करता‌ साथ घूमने जाता‌ यहां दिल्ली बुलाकर उन्हें घुमाने ले जाता पर अब यह संभव नहीं‌‌‌‌ हमारे बीच मौन का संवाद था‌ पर इस बार मौन का अंतराल इतना लंबा है कि जिंदगीभर मुझे उनकी आवाज नहीं सुनाई देगी‌  काश यह मौन इतना लंबा न होता‌&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-7356686676365285974?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/7356686676365285974/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=7356686676365285974&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/7356686676365285974'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/7356686676365285974'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='काश यह मौन इतना लंबा न होता'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-4794583586478171806</id><published>2008-09-07T02:05:00.000-07:00</published><updated>2008-09-07T02:31:28.274-07:00</updated><title type='text'>औरंगजेब की नजर में इल्म</title><content type='html'>धारणा या छवियां जिनके लिए सबसे ज्यादा नुकसानदेह होती हैं वे हैं हमारे इतिहास पुरुष। जब हम उन्हें  किसी खास नजरिए से देखने के आदी हो जाते हैं तो उनके व्यक्तित्व  के कुछ उजले पक्षों को जानने से महरुम हो जाते हैं। औरंगजेब को ऐसे ही शासकों में शुमार किया जा सकता है। इतिहास में उसे एक कटटर शासक के रुप में याद करता है लेकिन उसने अदब और तालीम के बारे में जो बातें कहीं हैं वे आज की दुनिया में भी महत्व रखती हैं। उसके दरबार में रहने का अवसर पाने वाले फ़्रांसीसी यात्री बरनियर ने एक घटना का जिक किया है जो शिक्षा संबंधी उसके विचारों पर प्रकाश डालती है। बरनियर ने लिखा है कि औरंगजेब का गुरु मुललासालह इस आशा से उसके दरबार में आया कि औरंगजेब उसे दरबार में अमीर बना देगा । पर अपनी बहन रोशनआरा बेगम की सिफारिश के बावजूद औरंगजेब ने तीन महीने तक उसकी खबर तक न ली। परंतु जब वह उसे दरबार में देखते-देखते तंग आ गया तो उसे एकांत में दरबार में उपस्थित होने का आदेश दिया और मुल्ला जी से कहा कि- आप चाहते हैं कि हम आपको दरबार के उमरा में शामिल कर लें लेकिन क्या आप इसके काबिल हैं। फरमाइये तो सही कि आपकी तालीम से मुझे कौन सी वाकफीयत हासिल हुई है---क्या  मुझ जैसे शख्स के उस्ताद को लाजिम न था कि दुनिया की हरएक कौम के हालात से मुझे मुत्तिला करता ---मुझको इलम तारीख ऐसी सिलसिलेवार पढाता कि मैं हर एक सलतनत की बुनियाद असबाब तरककी और उन वाकयात से वाकिफ हो जाता जिनके वायस उनमें इनकलाबात होते रहते हैं----बावजूद कि बादशाह को हमसाया कौमों की जबानों से वाकिफ होना जरुरी है आपने मुझको अरबी पढना सिखाया। इस जबान को सीखने में मेरी उमर का एक बडा हिससा जाया हुआ। कया नमाज सिरफ अरबी के जरिए ही अदा हो सकती है और बडी-बडी इलमोहुनर की बातों को जानना क्या अरबी के जरिए ही हो सकता है---आप मुझे वे बातें सिखाते जिससे जेहन इस काबिल हो जाता है कि बगैर सही दलील के किसी बात को तसलीम नहीं करता---वह सबक पढाते जिससे इंसान की तबीयत ऐसी हो जाती कि दुनिया के इंकलाबात का उसपर कुछ भी असर नहीं होता है और वह तरककी और तनजजुली की हालत में एक सा ही रहता है। क्या आप नहीं जानते थे कि शहजादों को इतनी बात जरुर सिखानी चाहिए कि उनकी रियाया से और रियाया को उनके साथ किस तरह का बरताव करना लाजिम है---बस अपने गांव को चले जाइए और अब से कोइ न जाने कि आप कौन हैं और आपका क्या हाल है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-4794583586478171806?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/4794583586478171806/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=4794583586478171806&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/4794583586478171806'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/4794583586478171806'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='औरंगजेब की नजर में इल्म'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-8957431510009682202</id><published>2008-08-24T01:52:00.000-07:00</published><updated>2008-08-24T02:00:14.451-07:00</updated><title type='text'>बारह साल के साकी</title><content type='html'>मैं शराब नहीं पीता लेकिन शराब को जहर भी नहीं मानता। पीने-पिलाने वालों की सोहबत मुझे अच्छी लगती है। मेरे साथ बैठता हूं। सलाद वगैरह बनाने में मदद करता हूं और कोल्ड डि्क का गिलास हाथों में लेकर उनका साथ भी देता हूं। लेकिन इसके बावजूद मेरा मानना है कि यह ऐसी चीज भी नहीं है कि इसके बिना जिंदगी अधूरी हो। खासतौर पर बच्चों को तो इससे दूर ही रखा जाना चाहिए। लेकिन बस से लखनउ जाते समय समय मैंने साहिबाबाद बस अडडे में एक बच्चे को बीयर बेचते हुए भी देखा था। वैशाली में जहां मैं रहता हूं मैंने बच्चों को ही साकी की भूमिका निभाते हुए देखा है। शाम ढलते ही लोग माडल मधुशाला के किनारे अपनी गाडियां खडी कर देते हैं। दस बारह साल के बच्चे उनकी गाडियों को घेर लेते है। फिर एसी गाडियों में बैठे-बैठे ही बच्चों से मनपसंद डिंक की बोतल मंगाई जाती है। कार में मधुर संगीत के साथ शराब का आनंद उठाने के बाद लोग बच्चों को टिप और खाली बोतलें थमा कर घर वापस लौट जाते हैं। आप राहत महसूस कर सकते हैं ये हमारे घरों के बच्चे नहीं होते। ये वे बच्चे हैं जिनहें स्ट्रीट चाइल्ड कह कर हम ध्यान ही नहीं देते। पर यह राहत की बात नहीं। आप माने न माने ये बच्चे भी हमारे ही समाज का हिस्सा हैं। अगर हम इन बच्चों को स्कूल नहीं भेज सकते इनके खाने-पीने का इंतजाम नहीं कर सकते तो इनके हाथों में बोतल थमाने का हक हमें किसने दिया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-8957431510009682202?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/8957431510009682202/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=8957431510009682202&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/8957431510009682202'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/8957431510009682202'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/08/blog-post_24.html' title='बारह साल के साकी'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-7488479615784006288</id><published>2008-08-11T08:49:00.000-07:00</published><updated>2008-08-18T08:58:25.508-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='न्यूज चैनल एलियंस'/><title type='text'>बनाते हैं चैनल वाले</title><content type='html'>कुछ दिन हुए सैलून में कटिंग करा रहा था। मेरे खतों को ठीक करने के लिए नाई ने अपनी आंखें मेरे गरदन पर टिका रखी थी। उसने एक हाथ से मेरे सिर को जोर से पकड रखा था ताकि मैं अपना सिर हिलाकर उसके काम में बाधा न पहुंचा सकूं। सिर झुकाए हुए मैं सैलून में रखे टीवी की आवाज भर सुन पा रहा था। न्यूज चैनल पर एलियंस के बारे में कोई प्रोग्राम आ रहा था। एंकर ने चीखते हुए कहा- घर से निकलने से पहले एक बार आसमान की ओर जरूर देख लें। वह शायद आसमान से उतरने वाले किसी खतरे के बारे में आगाह कर रहा था। एंकर की इस आवाज के साथ ही मेरे कानों को एक दूसरी आवाज भी सुनाई दी- साले चूतिया बनाते हैं। यह मेरे नाई की आवाज थी। मैंने कहा जब चूतिया बनाते हैं तो चैनल देखते ही जरूर क्यों हो मैंने पूछा। उसने कहा रशीद भाई के अलावा कोई नहीं देखता। रशीद भाई दुकान के मालिक होंगे। इसलिए वह जो देखेंगे बेचारों को देखना पडता होगा। आज अखबार में पढा प्रोफ़ेसर यशपाल कह रहे थे कि न्यूज चैनलों पर दूसरी दुनिया और एलियंस आदि के बारे में बेसिर पैर की बातें दिखाई जाती हैं मैंने तो इस तरह के डिसकशन में जाना ही छोड दिया है। यशपाल अगर लेमैन की भाषा में बोलते तो ठीक वही कह रहे होते जो उस नाई ने कहा था। जाहिर है अब न्यूज चैनलों के प्रोग्राम के बारे में नाई और वैज्ञानिक की राय एक जैसी है। कुछ दिन बाद रशीद भाई जैसे लोग भी इन चमत्कारिक कहानियों से उब ही जाएंगे। शायद तब यह मजाक बंद हो लेकिन तबतकमीडिया की छवि पर पर जो बटटा लग चुका होगा उसकी भरपाई कैसे होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-7488479615784006288?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/7488479615784006288/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=7488479615784006288&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/7488479615784006288'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/7488479615784006288'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='बनाते हैं चैनल वाले'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-9701838488973080</id><published>2008-04-26T22:44:00.000-07:00</published><updated>2008-04-26T22:47:38.114-07:00</updated><title type='text'>उगते हुए सूरज को आखिरी बार कब देखा था</title><content type='html'>फूल तो आप को भी अचछे लगते होंगे। गेंदा गुलाब जूही चंपा चमेली कमल ---दिमाग पर जोर डालें तो शायद कुछ नाम और याद आ जाएं। इनमें से किसी फूल को डाली पर झूमते हुए आखिरी बार कब देखा था आपने।फूलों को छोड़िए चिड़ियों की बातें करते हैं- कौवा कबूतर गौरैया बाज तोता मैना थोड़ी कोशिश करें तो कुछ नाम और याद आ सकते हैं पर यह तो बताइए कि इनमें से किसी पंछी की आवाज आखिरी बार कब सुनी थी।अब यह मत कह दीजिएगा कि पेड़ों को पहचानना मुशिकल हो सकता है पर उनके नाम से तो परिचित ही हैं। चलिए देखते हैं कितने पेड़ों के नाम ले सकते हैं आप---- आम जामुन पीपल महुआ पीपल बरगद कटहल वाकई बहुत से नाम जानते हैं आप पर यह तो बताइए किसी पेड़ की छांव में बैठ कर आखिरी बार कब सुसताए थे आप।जरा जोर डालिए दिमाग पर और बताइएउगते सूरज को आखिरी बार कब देखा थारात में चांद देखने की फुरसत कब मिली थी आपकोधरती को कब छुआ था आखिरी बारनदी या पोखर में कब लगाई थी डुबकी&lt;br /&gt;धरती से खतम होते जा रहे हैं पेड पौधे नदी तालाब यह कभी सोचा ----तब तो कम से कम एक पेड़ जरूर लगाया होगा आपने&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-9701838488973080?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/9701838488973080/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=9701838488973080&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/9701838488973080'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/9701838488973080'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/04/blog-post_26.html' title='उगते हुए सूरज को आखिरी बार कब देखा था'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-429485349448102389</id><published>2008-04-06T22:22:00.000-07:00</published><updated>2008-04-06T22:40:52.962-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बापू नंदीगाम कविता वाम'/><title type='text'>ढलती शाम चाय की चुस्कियां और अरुण आदित्य की कविताएं</title><content type='html'>कल एक बार फिर नील पदम-१ में दोस्तो का जमावड़ा हुआ। एक सप्ताह पहले ही सबसे खुद को खाली रखने का आग्रह कर चुका था। पर क्या करें महानगर की विडंबना है कि छुटटी में भी छुटटी मुश्किल से ही मिल पाती है। इसलिए हमेशा की तरह बहुत से लोगों ने आखिरी समय में माफी मांग ली। पर अपनी वैशाली में कविता लिखने और सुनने वालों की कमी नहीं सो कविता के कुछ रसिक जुट ही गए। ढलती शाम में चाय की चुस्कयों के साथ युवा कवि अरुण आदित्य ने अपनी नयी पुरानी ढेर सारी कविताएं सुनायीं। जन विकल्प में प्रकाशित अरुण जी की इन कविताओं का रसास्वादन आप भी करें-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैंने तो बस इतना पूछा था&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंधकूप के  &lt;span class=""&gt;अंधियारे में&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; दोपहर शाम कहां&lt;br /&gt;यूकेलिप्टस के जंगल में&lt;br /&gt;महुआ जामुन आम कहां&lt;br /&gt;चाहे जितना सेज सजाओ&lt;br /&gt;मेरे हिस्से काम कहां&lt;br /&gt;राजा हो तुम राज करो जी&lt;br /&gt;हमको है आराम कहां&lt;br /&gt;कौन सिरफिरा पूछ रहा है&lt;br /&gt;भइया नंदीगाम कहां&lt;br /&gt;मैंने तो बस इतना पूछा&lt;br /&gt;छांव कहां है घाम कहां&lt;br /&gt;तुम्हें लगा मैं पूछ रहा हूं&lt;br /&gt;राम कहां और वाम कहां&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बापू क्यों शरमाए हैं&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बापू तेरी जन्मभूमि पर&lt;br /&gt; राम-राज हम लाए हैं&lt;br /&gt;फिर भी तुम खुश नहीं&lt;br /&gt;तुम्हारे माथे पर रेखाएं हैं&lt;br /&gt;हिटलर भी था चुना हुआ&lt;br /&gt;हम भी चुनकर आए हैं&lt;br /&gt;हमने यह सच बोल दिया तो&lt;br /&gt;बापू क्यों शरमाए हैं&lt;br /&gt;ना कोई मरता ना  ही&lt;br /&gt;कोई सकता मार&lt;br /&gt;बापू कैसे भूल गए तुम&lt;br /&gt;गीता का यह सार&lt;br /&gt;अगर याद है तो फिर काहे&lt;br /&gt;चेहरा यूं लटकाए हैं&lt;br /&gt;क्यों गिनते हैं मेरे खाते&lt;br /&gt;में कितनी हत्याएं हैं&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-429485349448102389?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/429485349448102389/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=429485349448102389&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/429485349448102389'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/429485349448102389'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='ढलती शाम चाय की चुस्कियां और अरुण आदित्य की कविताएं'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-6822658735122282800</id><published>2008-03-23T11:10:00.000-07:00</published><updated>2008-03-23T11:13:20.549-07:00</updated><title type='text'>बहरों को सुनाने के लिए...</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;  अत्याचारी ब्रिटिश सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा बम के साथ जो परचा फेंका गया था वह ब्रिटिश सरकार द्वारा किए जा रहे राष्ट्रीय दमन और अपमान की स्थिति का बयान तो करता ही है इन देशभक्तों की  क्रान्ति विषयक अवधारणा के बारे में संकेत देता है। प्रस्तुत है पार्लियामेंट में फेंके गए परचे का हिंदी यह हिंदी अनुवाद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना&lt;br /&gt;सूचना&lt;br /&gt; बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज की जरूरत होती है प्रसिद्ध फ़्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियां के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं।&lt;br /&gt;पिछले दस सालों में ब्रिटिश सरकार ने शासन सुधार के नाम पर इस देश का जो अपमान किया है उसकी कहानी दोहराने की आवशयकता नहीं है और न ही हिंदुस्तानी पार्लियामेंट पुकारे जाने वाली इस सभा ने भारतीय राष्ट्र के सिर पर पत्थर फेंककर उसका जो अपमान किया है उसके उदाहरणों को याद दिलाने की जरूरत है। यह सर्व विदित और  स्पष्ट है। आज फिर जब लोग साइमन कमीशन से कुछ सुधारों के टुकडों की आशा में आंखें फैलाए हैं और इन टुकडों के लोभ में आपस में झगड रहे हैं विदेशी सरकार सार्वजनिक सुर‌‌‌क्षा विधेयक और औ‍द्यौगिक विवाद विधेयक के रूप में अपने दमन को और भी कडा करने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही आने वाले अधिवेशन में अखबारों द्वारा राजद्रोह रोकने का कानून जनता पर कसने की भी धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक काम करने वाले मजदूर नेताओं की अंधाधुंध गिरफतारियां यह स्पष्ट कर देती हैं कि सरकार किस रवैये पर चल रही है। राष्ट्रीय दमन और अपमान की इस उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व को गंभीरता से महसूस कर समाजवादी प्रजातंत्र संघ ने अपनी सेना को यह कदम उठाने की आज्ञा दी है। इस काम का प्रयोजन है कि कानून का यह प्रहसन समाप्त कर दिया जाए। विदेशी शोषक नौकरशाही जो चाहे करे परंतु उसकी वैधानिकता की नकाब फाड देना आवशयक है।&lt;br /&gt;जनता के प्रतिनिधियों से हमारा अनुरोध है कि वे इस पार्लियामेंट के पाखंड को छोडकर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के खिलाफ  क्रान्ति के लिए तैयार करें। हम विदेशी सरकार को यह बतला देना चाहते हैं कि हम सार्वजनिक सुर‌‌‌क्षा विधेयक और औ‍द्यौगिक विवाद विधेयक के दमनकारी कानूनों और लाला लाजपत राय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह कदम उठा रहे हैं।&lt;br /&gt;हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं हम ऐसे उज्ज्वल भविष्य में  विश्वास रखते हैं जिसमें हर व्यक्ति को पूरी शांति और स्वतंत्रता का अवसर मिल सके। हम इंसान का खून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परंतु क्रान्ति द्वारा सबको समान स्वतंत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त करने के लिए क्रान्ति में कुछ न कुछ रक्तपात जरूरी है।&lt;br /&gt;इंकलाब जिंदाबाद                                                          हस्ताक्षर बलराज&lt;br /&gt;                                                                                     कमांडर इन चीफ   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साभारःराजकमल प्रकाशन&lt;br /&gt;(  ८ अप्रैल सन १९२९ को असेंबली में बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा फेंके गए परचे का हिंदी यह हिंदी अनुवाद राजकमल पेपर बैक्स द्वारा प्रकाशित पुस्तक भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज से ली गयी है।)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-6822658735122282800?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/6822658735122282800/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=6822658735122282800&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/6822658735122282800'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/6822658735122282800'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/03/blog-post_23.html' title='बहरों को सुनाने के लिए...'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-1950796085824879189</id><published>2008-03-23T08:48:00.000-07:00</published><updated>2008-03-23T08:50:24.130-07:00</updated><title type='text'>आन के दुआर क चिरई</title><content type='html'>शादी करके बीवी के साथ दिल्ली वापस आया तो जिंदगी कुछ बदली सी लगी। सुखद और सुविधाजनक। घर बिलकुल साफ-सुथरा चीजें सलीके से रखी हुईं। समय पर पानी चाय खाना। अटपटा सा लगता है इतना व्यवस्थित होना। इतने सलीके से रहने की अपनी आदत रही नहीं। जब चाहा खाया जहां गए वहीं सो रहे। मन किया तो शेविंग की या वैसे ही घूमते रहे। अब मेरी हर चीज पर किसी की नजर होती है। कई बार जो बातें मेरे लिए साधारण सी होती हैं वह पत्नी की नजर में महत्वपूर्ण। कई बार उसके साथ रहते या चलते हुए सोचता हूं वह मेरा इतना ध्यान क्यों रखती है जबकि साथ रहने के बावजूद कई बार वह मुझे अजनबी सी लगती है। क्या मैं उसे अजनबी जैसा नहीं लगता। जबकि शादी के बाद वह खुद भी बदल गई है। एक दिन उसने मुझसे कहा कि जब वह आईना देखती है कभी-कभी खुद को देखकर लगता है कि अरे यह कौन है। सिंदूर बिंदी और नथ ने उसका चेहरा ही बदल दिया है। उसने बताया कि शादी से पहले जब वह अपने गांव आयी थी तो लोगों के कहने पर उसे नाक छिदवाना पडा था।शादी के बाद भी तो बहुत कुछ बदला होगा उसकी जिंदगी में। पर वह अपनी खुशी से जयादा मेरी खुशी की चिंता करती है। और कभी-कभी खुद उदास नजर आती है। घर से दिल्ली आते समय मां ने हम दोनों को अलग-अलग बुलाकर कुछ बातें कहीं थीं। उससे क्या कहा मैं नहीं जानता लेकिन मुझे कहा कि- देखो इसे कभी डांटना मत। न तो इसके सामने किसी और पर गुससा होना। घर के कामों में मदद करना। अपने मां-बाप घर परिवार को छोडकर तुम्हारे साथ रहने आयी है इसको खुश रखना अब तुम्हारी जिममेदारी है। ई आन के दुआर क चिरई ह पोसात-पोसात पोसाई। मां की बातों पर अमल करने की कोशिश करता हूं। फिर भी वह कभी-कभी उदास हो जाती है। पूछता हूं क्या हुआ तो टाल जाती है पर उसकी आंखों की नमी सब कह जाती है। मां का कहना याद आ जाता है आन के दुआर क चिरई।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-1950796085824879189?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/1950796085824879189/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=1950796085824879189&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/1950796085824879189'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/1950796085824879189'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/03/blog-post.html' title='आन के दुआर क चिरई'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-5338735230553733516</id><published>2008-02-04T12:55:00.000-08:00</published><updated>2008-02-04T12:59:20.792-08:00</updated><title type='text'>यह शूटरों का शहर नहीं है भाईसाब</title><content type='html'>आजमगढ़-२&lt;br /&gt; बात-मुलाकात में किसी को पता चलता है कि मैं आजमगढ का रहने वाला हूं लोग बोल पडते हैं अरे अबू सलेम का आजमगढ़। चूंकि आजमगढ़ का हूं इसलिए यह पहचान बेचैन कर देती है। कोई आदमी यह तय करने की कोशिश कर सकता है कि उसकी पहचान कया हो लेकिन जगहें यह काम नहीं कर पातीं। वरना आजमगढ़ को कभी गवारा नहीं होता कि उसे अबू सलेम के नाम से जाना जाए। अगर किसी जगह को उनके रहने वालों के नाम से ही पहचाने की मजबूरी हो तो आजमगढ़ को अबू सलेम के नाम से नहीं अललामा शिबली नोमानी के नाम से पहचाना जाना चाहिए। हम आजमगढ़ को हिंदी खड़ी बोली का पहला महाकावय लिखने वाले  अयोधया सिंह उपाधयाय हरिऔध- राहुल सांकृतयायन- कैफी और शबाना आजमी से लेकर हिंदी आलोचक मलयज आदि के नाम से कयों नहीं पहचानते। आजमगढ़ की पहचान उसकी उरदू पुसतकालय बलैक पाटरी या मुबारकपुर के उन हुनरमंद जुलाहों से कयों नहीं की जाती जो दुनियाभर में मशहूर बनारसी साडियां बनाने का काम करते हैं। आजमगढ़ की पहचान बताते समय पाकिसतान के जनरल रह चुके असलम बेग और टिनिडाड के परधानमंतरी और पेसिडेंट रहे कासिम उतीम के पुरखों को भी तो याद किया जा सकता है। आजमगढ़ की पहचान टीवी पर अंताछरी बनाकर मशहूर हुए गजेंदर सिंह फिलम डाइरेकटर  राजेश सिंह और दुनियाभर में फैले वे तमाम लोगों कयों नहीं हो सकते जो गुमनाम ही सही पर मेहनत मजूरी करके ईमानदारी की रोजीरोटी कमा खा रहे हैं।अभी पिछले दिनों जब मैं आजमगढ़ आया तो एक पंदरह साल के बचचे को छोटी सी टू सीटर कार चलाते देखकर दंग रह गया। चंदन नाम के इस बचचे ने टाटा की नैनो आने से बहुत पहले ही अपनी कार फेम को आजमगढ़ की सड़कों पर उतार दिया था। उसने सकूटर के कल पुरजों को जोड़कर पचीस हजार कीमत वाली यह कार बनाई है जो एक लीटर में चालीस किलोमीटर की दूरी तय करती है। कया आपने चंदन का नाम सुना है।आप आजमगढ़ को चंदन के नाम से कयों नहीं पहचानते।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-5338735230553733516?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/5338735230553733516/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=5338735230553733516&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/5338735230553733516'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/5338735230553733516'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/02/blog-post.html' title='यह शूटरों का शहर नहीं है भाईसाब'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-8030739930025751825</id><published>2008-02-01T10:28:00.000-08:00</published><updated>2008-02-01T12:10:03.285-08:00</updated><title type='text'>आज़मगढ़-1</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;आज़मगढ़! बहुत बदल गया यह शहर. हमारे बचपन मे यह हरा-भरा और खूबसूरत शहर हुआ करता था.  पर आज़कल इस शहर में भीड़ बढ़ती जा रही है.जब भी घर जाता हूं, इसे और भी शोरगुल और भीड़ से भरा हुआ पाता हूं. इस बार जब रिक्शे पर बैठकर स्टेशन से घर की ओर चला, तो सड़क पर कुछ ज्यादा ही शोरगुल दिखा.टौंस पर बने पुल पर नए किस्म की लाइटें लगी हुई थीं.&lt;/span&gt; उस बड़े से मैदान जो अग्रेज़ो के ज़माने में पोलो ग्राउड हुआ करता था, में चल रहा आज़मगढ़ महोत्सव समाप्त हो चुका था. गिरजाघर चौराहा का नाम अब न्याय चौराहा हो चुका था.  आज़मगढ़ महोत्सव इस बार काफ़ी भव्य रहा और हंगामेखेज भी. विवेकानंद की तस्वीर स्टेज पर रखने और स्कूली बच्चों द्वारा खेले जा रहे नाटक में सीता के जींस-टाप पहनने को लेकर खूब बवाल मचा. देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी लोग धार्मिक रूप से काफ़ी संवेदनशील  हो चुके हैं. हर बार की तरह इस बार भी टौंस नदी के घाट पर दोस्तों के साथ देर तक बैठा रहा. नाव की सैर की. नदी में नहाना भी चाहता था लेकिन अब टौंस का पानी इतना गदा हो चुका है कि नहाने लायक नहीं रहा. &lt;span class=""&gt;टौंस गंदी और छिछ्ली होती जा रही है. हमारे बचपन में टौंस के किनारे खेती होती थी अब इसके किनारे पर घर बनते जा रहे हैं.  यही हाल रहा तो कुछ सालों में यह नदी गंदे नाले में बदल जाएगी. काश हम अपनी नदी तालाबों के प्रति भी थोड़े संवेदनशील हो पाते.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-8030739930025751825?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/8030739930025751825/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=8030739930025751825&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/8030739930025751825'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/8030739930025751825'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/02/1.html' title='आज़मगढ़-1'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-2704286626045118864</id><published>2008-01-26T03:33:00.000-08:00</published><updated>2008-02-01T10:27:20.208-08:00</updated><title type='text'>अरे भौजी ऊख छीलत हईं</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;आज़मगढ़&lt;/span&gt; से दिल्ली में पढाई करने आया और यहीं रोटी- रोज़गार का जुगाड़ हो गया। पर अपने घर- गांव की याद तो कचोटती ही रहती है। घर जाने का मौका मिले तो मन उमंग से भर जाता है। इस बार घर जाने का प्लान तो बहुत पहले ही बन गया था, पर आदत के अनुसार टिकट कटवाने में आलस कर गया। कैफियत में वेटिंग सीट का टिकट मिला था पर बाद में कन्फर्म हो गया। कैफी आज़मी के नाम पर चलने वाली इस ट्रेन में पुरबिए भरे रहते हैं। दिल्ली से आज़मगढ़ तक के लिए कोई ट्रेन हो इसके लिए कैफी ने ही नहीं शबाना ने भी बहुत कोशिश की थी। उन्ही की कोशिशों की देना है यह ट्रेन। खैर, सीट खोज-खाजकर बैठा। ट्रेन में जल्दी सोने&lt;br /&gt;की मेरी आदत है। सुबह जब &lt;span class=""&gt;जब आंख खुली तो ट्रेन शाहगंज पहुंच चुकी थी.&lt;/span&gt; इसके बाद तो त्रेन जैसे ठिठक-ठिठककर चलने लगी। ऐसा हमेशा ही होता है. लोग अपनी सुविधा के अनुसार चेन पुलिग कर ट्रेन से उतर लेते हैं. ऐसे स्थिती में घर पहुँचने की अधीरता इतनी ज्यादा होती है कि ट्रेन एक पल के भी रुके तो कोफ्त होने लगती है। पर उतरने वाले भी क्या करें उन्हें भी तो जल्दी होती है. मैं यही सब सोच ही रहा था कि मेरे बगल वाली सीट पर बैठे एक लड़के ने अपने सहयात्री से कहा, अरे भौजी ऊख छीलत हईं. फ़िर क्या था. ट्रेन रुक गयी. दोनो झोला- मोटरी लिए उतर गये. जब तक हमारी ट्रेन फ़िर से आगे बढ़ती वे दोनों अपनी भौजी के पास पहुच चुके थे. हंसी-मजाक शुरू हो चुका था. मेरी ही तरह कई लोग उन्हे देख रहे थे, घर पहुंचने की जल्दी भूलकर लोग मुस्कराने लगे थे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-2704286626045118864?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/2704286626045118864/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=2704286626045118864&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/2704286626045118864'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/2704286626045118864'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/01/blog-post_26.html' title='अरे भौजी ऊख छीलत हईं'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-1914298824668301229</id><published>2008-01-06T05:20:00.000-08:00</published><updated>2008-01-06T07:08:16.096-08:00</updated><title type='text'>उसी बस वाली लड़की के तमाचे की आवाज़ होगी</title><content type='html'>&lt;span style="font-style: italic;"&gt;बहुत&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;दिनों&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;ब्लोगिंग&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;से&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;दूर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;रहा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;इस&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;बीच&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;बहुत&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;महत्वपूर्ण&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;घटनाएँ&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;घटीं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;जिन&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;पर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;लिखने&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;का&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;मन&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;पर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;सबसे&lt;/span&gt; &lt;span style="font-style: italic;"&gt;पहले&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;अपनी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;कविता&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic; font-weight: bold;"&gt;बस&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic; font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic; font-weight: bold;"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic; font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic; font-weight: bold;"&gt;लड़की&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic; font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;पर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;अमर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;उजाला&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;सजग&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;पत्रकार&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;शाश्वती&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;विचार&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;आप&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;तक&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;पहुँचा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;रहा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;हूँ&lt;/span&gt; ।&lt;br /&gt;बस में लड़की और विशेषकर दिल्ली के बस की लड़की की कहानी कुछ-कुछ वैसी ही है, जैसा आपने लिखा है। पूरी तरह से इसलिए नहीं क्यों कि  जिस तरह ब्लू लाइन की जगह है कपैसिटी बस ले रही हैं, ठीक वैसे ही यहाँ की लड़कियाँ भी बदल रही हैं। क्यों कि बस की रेलमपेल और धक्का -मुक्की में कोई उसके कुल्हे पर हाथ रखता है, तो वह उएसे सुख में सिहरने की जगह अपने चांटे से सिहरा देने और कान लाल करने की छमता रखती हैं। मेरी इस बात को फेमिनिस्म से जोड़कर देखने की जगह महिलाओं द्वारा अपनी रक्षा खुद कर सकने, अश्लील हरकत पर समाज की चिंता किए बिना प्रत्रिक्रिया करने की बढ़ती क्षमता के साथ देखें तो बात को बेहतर समझा जा सकता है। दरअसल, बस में किसी पुरुष द्वारा धक्का देने,  देह छूने की कोशिश करने से उसका मन पहले भी लिजलिजा हो जाता था, पर शायद हिम्मत जवाब दे जाती थी।&lt;br /&gt;तो जनाब, अगली दफा जब दिल्ली की सड़कों पर भीड़ भरी बस में किसी लड़की की गुस्से से चीखने या तमाचा रसीद करने की आवाज़ सुने, तो हैरान न हों, वह उसी बस वाली लड़की के तमाचे की आवाज़ होगी, जो किसी पुरुष के छूने पर बस से बाहर झांकने या चुप होकर उसे सहने की बजाये करारा जवाब दे रही होगी।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;जो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;मैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कहना&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;चाहता&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;हूँ&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;-&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;शाश्वती&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; सच है कि  आज लड़कियां ज्यादा सजग हैं और सक्षम भी। उनकी मजबूती  आश्वस्त करती है। पर मेरी चिंता कुछ दूसरी है।जिस समाज में ताकत सुरक्षा की गारंटी हो उसे सभ्य समाज कैसे कहा जा सकता है। सारी तरक्की  के बावजूद हम &lt;span&gt;&lt;/span&gt; ऐसे  समाज में जी रहे हैं जिसे &lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt; अभी भी स्त्रियों का सम्मान करना सीखना है। अभी नए साल पर मुम्बई या पटना में क्या हुआ? स्त्रियों के अपमान या उन पर होने वाले अत्याचार तब तक ख़त्म नहीं होंगे, जब तक हम उनका सम्मान करना नहीं सीखते। हमें  &lt;span style="font-style: italic;"&gt;लड़कियों&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span style="font-style: italic;"&gt;रोना&lt;/span&gt; या &lt;span style="font-style: italic;"&gt;चूडियाँ&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;पहन&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;लो&lt;/span&gt; जैसे मुहावरे भूलने होंगे। लड़कियां बदलें और समाज की सोच भी। बात तो तब बनेगी। &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-1914298824668301229?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/1914298824668301229/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=1914298824668301229&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/1914298824668301229'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/1914298824668301229'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2008/01/blog-post_06.html' title='उसी बस वाली लड़की के तमाचे की आवाज़ होगी'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-3244759958275452267</id><published>2007-12-21T06:21:00.000-08:00</published><updated>2007-12-21T07:00:05.238-08:00</updated><title type='text'>बस में लड़की</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीड़&lt;/span&gt; के बहाने&lt;br /&gt;भीड़ से बचाकर&lt;br /&gt;उसके कूल्हे पर हाथ धरता हूँ&lt;br /&gt;वह सिहरती है&lt;br /&gt;मेरी कनपटियां सुर्ख हो जाती हैं&lt;br /&gt;बस की गति और विराम के साथ&lt;br /&gt;नींद भी शामिल है &lt;span class=""&gt;मेरे षडयंत्र में&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छूता हूं उसे बार-बार&lt;br /&gt;छूने से बचने का ढोंग रचते हुए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिमटती है&lt;br /&gt;दुबक जाती है&lt;br /&gt;खिड़की से देखती है बाहर&lt;br /&gt;मोबाइल पर पढ़ती है कोई पुराना मैसेज&lt;br /&gt;रिंग करके काटती है बार-बार&lt;br /&gt;घूंट-घूंट पीती है गुस्सा&lt;br /&gt;बस में लड़की&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-3244759958275452267?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/3244759958275452267/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=3244759958275452267&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/3244759958275452267'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/3244759958275452267'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2007/12/blog-post_21.html' title='बस में लड़की'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-8809702316706483909</id><published>2007-12-16T10:39:00.000-08:00</published><updated>2007-12-16T12:01:53.644-08:00</updated><title type='text'>उम्र अठारह महीने, शौक सिगरेट</title><content type='html'>पाजामे का नाडा बाँधने की तो बात ही छोड़िए.  &lt;span class=""&gt;जनाब ठीक से तुतलाकर बोल भी नहीं सकते, लेकिन सिगरेट का धुआं ऐसे उड़ाते हैं कि बड़े से&lt;span class=""&gt;  बड़े&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; सिगरेट के शौकीन उन्हें गुरू मान लें. जनाब शोहरत भी खूब बटोर रहे हैं.16 दिसंबर के अमर उजाला मे उनकी खबर फोटो के साथ छपी है. मुरादाबाद सम्भल के फ़तेहउल्ल्ला सराय मे रहने वाले रिजवान की उमर सिर्फ़ 18 महीने है. उनकी उम्र के बच्चे खिलौने लेने की ज़िद करते हैं, लेकिन जनाब को  सिगरेट न मिले तो चीख-पुकार मचाने लगते हैं. इस लिए घर वाले उनकी बीड़ी-सिगरेट उनके पास ही रखते हैं, ताकि उन्हें जब भी तलब मह्सूस होइत्मीनान से सुटटा मार सकें. सुबह उठते ही वह दूध की बोतल की जगह सिगरेट के लिए मचलने लगते हैं. कोई पास आये तो बीड़ी की तलाश में उसकी &lt;span class=""&gt;जेबें टटोलने लगते हैं. वे एक के बाद एक कई सिगरेट पी सकते हैं. ना ही सिगरेट का स्वाद उन्हें खराब लगता है और न ही सिगरेट पीते हुए&lt;/span&gt; उन्हें खांसी आती है.&lt;br /&gt;ज़ाहिर है यह आदत वे पेट से सीखकर नहीं आये होंगे.घर -परिवार के ही किसी महानुभाव ने उन्हें यह लत लगायी होगी. यह गंदा काम चाहे जिसने भी किया हो.उसकी सज़ा क्या होगी. क्या उसे कोई सजा मिलेगी?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-8809702316706483909?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/8809702316706483909/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=8809702316706483909&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/8809702316706483909'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/8809702316706483909'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2007/12/blog-post_16.html' title='उम्र अठारह महीने, शौक सिगरेट'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-2377008885970493674</id><published>2007-12-14T10:46:00.000-08:00</published><updated>2007-12-14T11:57:34.775-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धन्यवाद पूनम'/><title type='text'>वे गाली पर भी अपना अधिकार चाहते हैं</title><content type='html'>&lt;em&gt;पूनम अमर उजाला में फीचर विभाग में काम करतीं हैं, वैचारिक बहस में यकीन रखने वाली पूनम अपनी बातें बहुत स्पस्ट रुप से कहने के लिए जानी जाती हैं। मेरे चिट्ठे &lt;strong&gt;जरा जुबान पर लगाम दीजिए हुजूर&lt;/strong&gt; पर उन्होंने अपनी टिप्पणी कुछ इस तरह की है-&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;ब्रजेश जी आपका यह लेख और भी आकर्षक व रोचक हो जाता, यदि आप इसमे सभ्य समाज के सभ्य लोंगों द्वारा बड़ी सहजता के साथ बोली जाने वाली गालियों का जिक्र भी करते।  खैर, आपकी तरह मैं भी इन शब्दों के प्रयोग से बचते हुए अपनी बात कहूंगी।&lt;br /&gt;गालियाँ न केवल सिर्फ औरतों पर बनी हैं , बल्कि पुरुषों द्वारा दी जाने वाली गलियां  पुरुष वादी  मानसिकता और उसके पुरुष होने के दंभ को भी दर्शाती हैं। गालियों के मतलब पर ही ध्यान दें , तो लगता है कि ये भी महिलाओं के अस्तित्व को देह तक सीमित कर देने की सोच की ही उपज है। दो लोगों की लड़ाई शुरू नहीं कि गालियों का सिलसिला शुरू हो जाता है और वे बेकसूर अपमानित होती चली जाती हैं। महिला की देह न हुई जैसे अखाडा हो गया अपनी कुंठा और भड़ास निकालने का। कितना कॉमन सा शब्द बन गया है साला! लोग बडे प्यार से आपसी बातचीत में इस शब्द का इस्तेमाल करते हैं। दूसरे की बहन कितनी सहजता से अपनी बन जाती है। गालियों की सहजता में इससे अधिक शर्मनाक क्या होगा जब बाप बेटे पर गुस्सा होकर बहन की गाली या भाई -भाई आपस में माँ बहन की गाली देते हुए पाए जाते हों।&lt;br /&gt;जिस समाज में दूसरे व्यक्ति को अपमानित करने के लिए माँ -बहन की गाली दी जा रही हो, वहाँ यत्र नर्येस्तु पूज्यन्ते ... कहा जाए तो बड़ा विरोधाभास लगता है। यह लिखने और कहने की ज़रूरत नहीं कि सदियों से चली आ रही इन गालियों का चेतन और अवचेतन मन पर कितना गहरा असर होता है। &lt;strong&gt;जिस समाज में एक लडकी किसी को जिल्लत या अपमानित करने का माध्यम हो, तो कैसे माना जा सकता है कि उस समाज में लडकी का जन्म किसी परिवार के लिए ख़ुशी का सबब होगा। &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;एक बात और लिखना चाहूँगी कि &lt;strong&gt;गालियाँ देने का अधिकार भी शायद पुरुष अपने पास ही रखना चाहते हैं। जब कोई लडकी लड़कों को उन्हीं  की जुबान में मोटी-मोटी गालियों में जवाब देती है, तो वह लोगों की नज़रों में बद्तमीज बदचलन,और न जाने क्या-क्या बन जाती है।&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-2377008885970493674?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/2377008885970493674/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=2377008885970493674&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/2377008885970493674'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/2377008885970493674'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2007/12/blog-post_14.html' title='वे गाली पर भी अपना अधिकार चाहते हैं'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-1045162068430603899</id><published>2007-12-09T07:44:00.000-08:00</published><updated>2007-12-11T03:34:22.915-08:00</updated><title type='text'>ज़ुबान पर लगाम लगाइए हुज़ूर!</title><content type='html'>दोपहर में आफिस से निकल कर ठेले की चाय पीने जरूर जाता हूँ। नाली के किनारे खड़ा ठेला, भिनभिनाती मक्खियाँ, गाड़ियों के गुजरने से उड़ती धुल और गालियों से गूंजते वातारण में चाय की चुस्की का जो मजा है, वो आफिस की मशीन वाली चाय में कहा? उस दिन भी अपने दोस्त के साथ ठेले वाली चाय का आनंद उठा रहा था कि कानों में आवाज़ पड़ी-... दरअसल आप बहुत चूतिये हैं।&lt;br /&gt;ये दो दोस्तों के बीच हो रही बातचीत का एक टुकडा था, जो मेरे कानों में पड़ा था। इतने सयंत स्वर में, कान्वेंटई लहजे और इतने आदर के साथ गाली दी गई थी कि मैं सोचने पर मजबूर हो उठा। गालियाँ हमारी जुबान के साथ इस&lt;br /&gt;कदर जुडी हुई हैं कि कब मुँह से निकल जातीं हैं पता ही नहीं चलता। किसी से गुस्सा हों और गाली न दें, ऐसा हो सकता है भला! &lt;span class=""&gt;कुछ लोगों के लिए यह तकियाकलाम है&lt;/span&gt;, तो कुछ लोग प्यार &lt;span class=""&gt;जताने के लिये गालियों का उपयोग करते हैं, मैने एक औघड़ बाबा के बारे में सुना है,जो गालिया देकर आशिर्वाद देते थे&lt;/span&gt;। कभी-कभी हम मनोरजन के लिये भी गालियो का यूज करते हैं। इलाहाबाद के हिन्दु हास्टल मे जब लाईट चली जाती थी, तो दोनो ब्लाक मे गालियो का मुकाबला होता, जब तक लाईट नही आती हम एक दूसरे को गालिया देकर अपना मनोरन्जन करते थे। यहां तक कि हममें नई-नई गाली गढने की होड़ लगी रह्ती थी।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;अपने देश &lt;/span&gt;मे तो होली जैसे त्योहार पर ही नहीं, शादियों मे भी गालियां गाने की रही है।शादियो मे तो लोग एक दूसरे के नाम की परचियां गीत गाने वाली महिलाओं के पास भेजते थे, ताकि वे उनका नाम लेकर गाली दे। जिनका नाम वे नहीं जान पातीं, उनको नीली शर्ट, लाल शर्ट वाले कह्कर गाली देती. जिन लोगों को बारात में गाली नही मिलती उन्हे लगता जैसे बारात मे उनकी खातिर ही नही की गयी। लेकिन जब मैं बात-बात पर गलियां बकता था और अब जब कि कभी-कभार मुंह से गलियां निकल ही जाती हैं। मैं अकसर सोचता हूं कि &lt;span class=""&gt;हर गाली की चपेट में कोई स्त्री या जानवर ही क्यों आता&lt;span class=""&gt; दुनिया के किसी भी देश में गालियां जानवरों के नाम और औरतों के अपमान से ही क्यों जुड़ी हुई हैं?&lt;/span&gt; अगर गालियां स्त्रियों का अपमान करती हों, तो क्या हमें अपनी जुबान पर लगाम लगाने की जरूरत नहीं . &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-1045162068430603899?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/1045162068430603899/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=1045162068430603899&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/1045162068430603899'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/1045162068430603899'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2007/12/blog-post_09.html' title='ज़ुबान पर लगाम लगाइए हुज़ूर!'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-3453369098968305597</id><published>2007-12-03T02:39:00.001-08:00</published><updated>2007-12-03T03:15:33.317-08:00</updated><title type='text'>तुम किससे हारी तसलीमा ?</title><content type='html'>तुम हार गयी तसलीमा। तुम्हारे लिखे ने उतना छाप नहीं छोडा था , जितना तुम्हारे जुझारूपन ने। कठमुल्लों के फतवे सुने, देश छोड़ना पड़ा पर ना तो तुम झुकी न तुम्हारी कलम।   क्या तुम लड़ते- लड़ते कमज़ोर हो गयी तसलीमा ?&lt;br /&gt;यकीन नहीं होता। फिर क्या हुआ तसलीमा ? दुनिया भर घूमने के बाद तुमने शरण लेने के लिए तुमने वह  देश चुना, जो तुम्हारा ही था, ४७ की दीवार बनने के पहले।   वही बोली - बानी वही मच्छी-भात, तुम्हारा प्यारा कोलकाता। पर धर्मनिरपेक्षता की पैरोकार माकपा सरकार के लिए तुम खतरा बन गयी। अगर तुम कोलकता की शांति के लिए खतरा थी, तो बुद्ध देव बाबू क्या हैं? तुम कठमुल्लों से तो लड़ सकती थी पर धर्मनिरपेक्षता के ढोंग से नहीं।&lt;br /&gt;एक तरफ गुजरात की प्रयोगशाला के वैज्ञानिक हैं, तो दूसरी तरफ कठमुल्लों की भीड़। तुम इनके खेल का मोहरा न बन जाओ एक  भय यह भी तो रहा होगा!&lt;br /&gt;तुमने कहा मैं भारत को खोना नहीं चाहती, पर भारत तो कबका खो चुका है।   उदार, सहिष्णु विशाल हृदय वाला भारत तो कहीं खो गया है। अपने सपनों के भारत को खोज न पाने की निराशा में तो ये कदम नहीं उठा लिया?&lt;br /&gt;तुम किस से हारी तसलीमा?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-3453369098968305597?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/3453369098968305597/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=3453369098968305597&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/3453369098968305597'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/3453369098968305597'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2007/12/blog-post.html' title='तुम किससे हारी तसलीमा ?'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-4115051468838644846</id><published>2007-11-30T08:42:00.000-08:00</published><updated>2007-12-01T22:35:29.320-08:00</updated><title type='text'>संघ के सौ आनन</title><content type='html'>यह किस आत्मा की आवाज़ है? कल तक जो एक हाथ में तलवारें और दूसरे हाथ में धर्म ध्वजा लेकर विधर्मियों को ललकार रहे थे, वे अचानक इतने दरिया दिल कैसे हो गए? तरुण विजय की किताब 'सैफरन सर्ज' के विमोचन के मौक़े पर सर संघचालक सुदर्शन जी ने पैगम्बर हजरत मोहम्मद को न केवल अरब एकता का सूत्रधार बताया बल्कि उन्हें शांति का मसीहा कह कर उनकी तारीफ भी की। तो क्या जो लोग यह मानते थे कि इस्लाम का प्रचार &lt;span class=""&gt;एक हाथ में&lt;/span&gt; तलवार और दूसरे हाथ में कुरान लेकर किया गया, उन्होने अपने विचार बदल दिए? या मुस्लिम तुष्टीकरण का राग अलापते-&lt;span class=""&gt;अलापते &lt;/span&gt;खुद तुष्टीकरण पर उतर आये?&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;जो आदमी&lt;/span&gt; जिन्ना को सेकुलर कहने वाले रथयात्री से उसका आसन छीन ले, आख़िर वह वैचारिक विचलन का शिकार कैसे हो गया? संघ में हाय -हाय मची है और लोग चकित हैं कि कहीं ये कोई चमत्कार तो नहीं?&lt;br /&gt;&lt;div&gt; धोखा है ...धोखा है। मुझे याद है वो दिन , जब हमारे शहर में जहाँ मेरी याद में कभी दंगे नहीं हुए, अयोध्या में मंदिर ढहने के बाद अचानक मेरा दोस्त शबीहुल हसन दुश्मन बन गया था। जब जलती हुई झोपडियों से चीखों की आवाज़ फिजाओं में गूँज रही थी, तब इनकी अंतर्रात्मा का अट्टहास सुना था आपने? बनारस की वह सुबह भी याद है, जब एक प्रचारक ने वहशी हुलस के साथ मुझसे कहा था, गुजरात में जमकर काटे जा रहे हैं ...वे। तब एक मुखौटे ने कहा था , मोदी ने राज धर्म का पालन नहीं किया ... फिर सो गयी थी उसकी अंतरात्मा। ये वो हैं , जो मिथक को विज्ञान और विज्ञान को मिथक में बदल सकते हैं। राम का रोज़गार करने वाले सत्ता के लिए कोई भी मुखौटा ओढ़ सकते हैं। संघ के सौ आनन हैं, कुछ भी बोल सकते &lt;span class=""&gt;हैं.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-4115051468838644846?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/4115051468838644846/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=4115051468838644846&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/4115051468838644846'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/4115051468838644846'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2007/11/blog-post_30.html' title='संघ के सौ आनन'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-3083387358811067212</id><published>2007-11-26T07:53:00.000-08:00</published><updated>2007-11-26T08:31:26.974-08:00</updated><title type='text'>भैंस पदुमनी नाचन लागी</title><content type='html'>दरिया साहब भी कबीर की तरह ही मुसलमान के घर के घर पले- बढे। उनके अनुयायी दरिया पंथी कहलाते हैं। ये सफ़ेद रंग का वस्त्र तहमत जैसा पहनते हैं। कंधे पर सफ़ेद चादर और हाथ में लोटा रखते हैं। बौद्धों की तरह ये भी सिर का मुंडन कराये रहते हैं। मुसलमान जिस तरह पांच बार नमाज पढ़ते हैं, उसी तरह ये भी दिन में पांच बार कोरनिश करते हैं।&lt;br /&gt;दरिया साहब की पहली पुस्तक दरिया सागर है।  उन्हों ने बीस ग्रंथों की रचना की।  कबीर की ही तरह उन्हों ने भी हिन्दू और मुसलमान दोनो के अन्धविश्वास और कर्मकांड पर कटाक्ष किया है।&lt;br /&gt;दरिया साहब की लिखी दो उलट्बासियाँ पेश हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गदहा मुख में वेणु बजाए, करहा पढ़ते गीता। &lt;br /&gt;भैंस पदुमनी नाचन लागी, यह कौतुक होय बीता।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मियां ने एक मुर्गी पाली, पाव, शीश, नहीं ठोरी,&lt;br /&gt;अलह नाम लेवे ना देती, ठोर चलावे चोरी ।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-3083387358811067212?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/3083387358811067212/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=3083387358811067212&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/3083387358811067212'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/3083387358811067212'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2007/11/blog-post_4636.html' title='भैंस पदुमनी नाचन लागी'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-970399111956398147</id><published>2007-11-26T06:08:00.001-08:00</published><updated>2007-11-26T07:26:01.955-08:00</updated><title type='text'>कबीर के अवतार</title><content type='html'>कबीर दास ने धार्मिक पाखंड और अवतारवाद का खंडन किया और निर्गुण-निराकार की उपासना पर जोर दिया। लेकिन बाद में कुछ संतों द्वारा खुद को कबीर का अवतार घोषित करने के उदाहरण भी मिलते हैं। शायद ऐसा उनहोंने कबीर की परंपरा से खुद को जोड़ने के लिए किया होगा।  ऐसे ही एक संत दरिया साहब का जन्म १६३४ ईसवी में बिहार के सासाराम में हुआ था।  दरिया साहब भी कबीर की ही तरह निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। उनहोंने अपने को कबीर का पांचवां अवतार बताते हुए कहा है कि ' हम ही कबीर काशी में रहऊ'।&lt;br /&gt;दरिया साहब ने अपने ग्रंथ दीपक ज्ञान में कबीर के पांच अवतारों का जिक्र किया है।  वे लिखते हैं कि कबीर सतयुग में सुकृत नाम से राजा योग धीर के यहाँ अवतरित हुए।  त्रेता युग में उन्हों ने धर्म सेनी के नाम से जन्म लिया। द्वापर  में उनका अवतार मुनीन्द्र नाम से हुआ और कलयुग में वह कबीर नाम से धरती पर आए। मृत्यु के बाद कबीर ने ही दरिया नाम से जन्म लिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-970399111956398147?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/970399111956398147/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=970399111956398147&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/970399111956398147'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/970399111956398147'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2007/11/blog-post_26.html' title='कबीर के अवतार'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3433391851965771223.post-186134592478125882</id><published>2007-11-24T02:01:00.000-08:00</published><updated>2007-11-24T02:25:43.677-08:00</updated><title type='text'>तीसरा ख़त</title><content type='html'>कुछ शब्द यूं ही लिख डाले थे मैंने&lt;br /&gt;कुछ वाक्यों का लिखा जाना&lt;br /&gt;बेहद जरूरी था&lt;br /&gt;बहुत कुछ कह लेने के बाद भी&lt;br /&gt;बाक़ी था, बहुत कुछ कहना&lt;br /&gt;इसलिए ज़रूरी था कि लिखा जाए&lt;br /&gt;दूसरा ख़त&lt;br /&gt;पहले ख़त के&lt;br /&gt;तुम तक&lt;br /&gt;पहुँचने से पहले&lt;br /&gt;दूसरे ख़त में लिखा मैंने&lt;br /&gt;सबसे ख़ूबसूरत दिनों&lt;br /&gt;और सबसे मुश्किल रातों के बारे में&lt;br /&gt;चाँद से अपनी बातचीत&lt;br /&gt;और उस सपने के बारे में&lt;br /&gt;जिसमें नदी के किनारे&lt;br /&gt;दौड़ रहे हैं हम साथ-साथ&lt;br /&gt;मैंने बताया&lt;br /&gt;तुम्हें&lt;br /&gt;कि दुनिया हो गई है कितनी बदरंग&lt;br /&gt;और कितना मुश्किल है&lt;br /&gt;बचाना अपने प्यार को&lt;br /&gt;आशा-आशंका&lt;br /&gt;प्यार और मनुहार से भरा&lt;br /&gt;दूसरा ख़त&lt;br /&gt;पोस्ट बाक्स के हवाले करने के बाद&lt;br /&gt;लौटने से पहले&lt;br /&gt;पल भर&lt;br /&gt;रुका मैं&lt;br /&gt;ध्यान से देखा पोस्ट बॉक्स को&lt;br /&gt;और एक तीसरा पत्र लिखने&lt;br /&gt;की ज़रूरत&lt;br /&gt;मैंने शिद्दत से महसूस की&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-186134592478125882?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/186134592478125882/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=186134592478125882&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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दर्द कम हो जाता है बातों से ही कोई बेगाना अपना हो जाता है लेकिन आज किसी के पास बात करने की फुरसत ही नहीं बस या ट्रेन में घंटों साथ-साथ यात्रा करते हैं लेकिन आपस में दो शब्द तक नहीं बोलते ग़ैर तो छोडिये अपनों से भी बात करने का समय नहीं रहा इससे पहले कि हम बात करना ही भूल जाएँ और लाफिंग थेरेपी की तरह टाकिंग थेरपी लेनी पड़े क्यों न हम बात करने की आदत को बनाए रखें तो चलिए कुछ बातें करते हैं, कुछ अपनी और ढेर सारी उनकी ...जिनके बारे में कोई बात नहीं करता&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3433391851965771223-8607013651711848685?l=chaighar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaighar.blogspot.com/feeds/8607013651711848685/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3433391851965771223&amp;postID=8607013651711848685&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/8607013651711848685'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3433391851965771223/posts/default/8607013651711848685'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaighar.blogspot.com/2007/11/blog-post.html' title='कुछ बातें हो जाएँ'/><author><name>ब्रजेश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03571247789113260736</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry></feed>
