Monday, February 4, 2008

यह शूटरों का शहर नहीं है भाईसाब

आजमगढ़-२
बात-मुलाकात में किसी को पता चलता है कि मैं आजमगढ का रहने वाला हूं लोग बोल पडते हैं अरे अबू सलेम का आजमगढ़। चूंकि आजमगढ़ का हूं इसलिए यह पहचान बेचैन कर देती है। कोई आदमी यह तय करने की कोशिश कर सकता है कि उसकी पहचान कया हो लेकिन जगहें यह काम नहीं कर पातीं। वरना आजमगढ़ को कभी गवारा नहीं होता कि उसे अबू सलेम के नाम से जाना जाए। अगर किसी जगह को उनके रहने वालों के नाम से ही पहचाने की मजबूरी हो तो आजमगढ़ को अबू सलेम के नाम से नहीं अललामा शिबली नोमानी के नाम से पहचाना जाना चाहिए। हम आजमगढ़ को हिंदी खड़ी बोली का पहला महाकावय लिखने वाले अयोधया सिंह उपाधयाय हरिऔध- राहुल सांकृतयायन- कैफी और शबाना आजमी से लेकर हिंदी आलोचक मलयज आदि के नाम से कयों नहीं पहचानते। आजमगढ़ की पहचान उसकी उरदू पुसतकालय बलैक पाटरी या मुबारकपुर के उन हुनरमंद जुलाहों से कयों नहीं की जाती जो दुनियाभर में मशहूर बनारसी साडियां बनाने का काम करते हैं। आजमगढ़ की पहचान बताते समय पाकिसतान के जनरल रह चुके असलम बेग और टिनिडाड के परधानमंतरी और पेसिडेंट रहे कासिम उतीम के पुरखों को भी तो याद किया जा सकता है। आजमगढ़ की पहचान टीवी पर अंताछरी बनाकर मशहूर हुए गजेंदर सिंह फिलम डाइरेकटर राजेश सिंह और दुनियाभर में फैले वे तमाम लोगों कयों नहीं हो सकते जो गुमनाम ही सही पर मेहनत मजूरी करके ईमानदारी की रोजीरोटी कमा खा रहे हैं।अभी पिछले दिनों जब मैं आजमगढ़ आया तो एक पंदरह साल के बचचे को छोटी सी टू सीटर कार चलाते देखकर दंग रह गया। चंदन नाम के इस बचचे ने टाटा की नैनो आने से बहुत पहले ही अपनी कार फेम को आजमगढ़ की सड़कों पर उतार दिया था। उसने सकूटर के कल पुरजों को जोड़कर पचीस हजार कीमत वाली यह कार बनाई है जो एक लीटर में चालीस किलोमीटर की दूरी तय करती है। कया आपने चंदन का नाम सुना है।आप आजमगढ़ को चंदन के नाम से कयों नहीं पहचानते।

5 comments:

Mired Mirage said...

आप अपने इस आजमगढ़ से पहचान करवाइये हम मिलने व याद रखने को तैयार हैं ।
घुघूती बासूती

आशीष महर्षि said...

इसके लिए कहीं न कहीं हम ही जिम्‍मेदार हैं, हमें लगता है कि यदि हम कहेंगे कि हम आजमगढ़ के हैं तो लोग अबू सलेम का आजमगढ़ कहेंगे, जिसके कारण हम अपनी पहचान ही नहीं बताते हैं और एक समय ऐसा आता है अबू सलेम का आजमगढ़ ही सामने आता है

vimal verma said...

बहुत अच्छे उदाहरण से आपने अपनी बात रखी,मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हूँ,आज़मगढ़ के हरिऔधजी,या शिबली मंज़िल जैसी उर्दू की सबसे बड़ी लाइब्रेरी सबका अपना स्थान है....और मुबारकपुर में की बनारसी साड़ियाँ, निज़ामाबाद का टेरा कोटा का काम सब तो साथी मशहूर है....पर समझने समझने की बात है..वैसे ऐसी बहसों का अन्त भी कहाँ है...

mayank said...

आप दुखित ना हों अबू सलीम के नाम से आजमगढ़ को जानने वाले उसी के मानसिकता के लोग है आप को उससे परेशान होने की जरुरत नही है मैं भी आजमगढ़ का ही रहने वाला हूँ. आजमगढ़ को शिबली नोमानी, हरिओध, हल्दीघाटी के महान रचईता श्याम नारायण पांडे, राहुल, कैफी साहब आदि आदि .. का नाम बहुत सम्मान से आज भी लिया जाता है. और लिखिए आजमगढ़ के बारे में. बहुत प्यारा शहर है मेरा |

zubair said...

brijesh bhaiya i am ZUBAIR.
we met in kaifiyat express.
and bhabhi kaisi hai?
apka blogs bahut acha laga,
i pray to god u earn name and fame also............................