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Friday, December 14, 2007

वे गाली पर भी अपना अधिकार चाहते हैं

पूनम अमर उजाला में फीचर विभाग में काम करतीं हैं, वैचारिक बहस में यकीन रखने वाली पूनम अपनी बातें बहुत स्पस्ट रुप से कहने के लिए जानी जाती हैं। मेरे चिट्ठे जरा जुबान पर लगाम दीजिए हुजूर पर उन्होंने अपनी टिप्पणी कुछ इस तरह की है-
ब्रजेश जी आपका यह लेख और भी आकर्षक व रोचक हो जाता, यदि आप इसमे सभ्य समाज के सभ्य लोंगों द्वारा बड़ी सहजता के साथ बोली जाने वाली गालियों का जिक्र भी करते। खैर, आपकी तरह मैं भी इन शब्दों के प्रयोग से बचते हुए अपनी बात कहूंगी।
गालियाँ न केवल सिर्फ औरतों पर बनी हैं , बल्कि पुरुषों द्वारा दी जाने वाली गलियां पुरुष वादी मानसिकता और उसके पुरुष होने के दंभ को भी दर्शाती हैं। गालियों के मतलब पर ही ध्यान दें , तो लगता है कि ये भी महिलाओं के अस्तित्व को देह तक सीमित कर देने की सोच की ही उपज है। दो लोगों की लड़ाई शुरू नहीं कि गालियों का सिलसिला शुरू हो जाता है और वे बेकसूर अपमानित होती चली जाती हैं। महिला की देह न हुई जैसे अखाडा हो गया अपनी कुंठा और भड़ास निकालने का। कितना कॉमन सा शब्द बन गया है साला! लोग बडे प्यार से आपसी बातचीत में इस शब्द का इस्तेमाल करते हैं। दूसरे की बहन कितनी सहजता से अपनी बन जाती है। गालियों की सहजता में इससे अधिक शर्मनाक क्या होगा जब बाप बेटे पर गुस्सा होकर बहन की गाली या भाई -भाई आपस में माँ बहन की गाली देते हुए पाए जाते हों।
जिस समाज में दूसरे व्यक्ति को अपमानित करने के लिए माँ -बहन की गाली दी जा रही हो, वहाँ यत्र नर्येस्तु पूज्यन्ते ... कहा जाए तो बड़ा विरोधाभास लगता है। यह लिखने और कहने की ज़रूरत नहीं कि सदियों से चली आ रही इन गालियों का चेतन और अवचेतन मन पर कितना गहरा असर होता है। जिस समाज में एक लडकी किसी को जिल्लत या अपमानित करने का माध्यम हो, तो कैसे माना जा सकता है कि उस समाज में लडकी का जन्म किसी परिवार के लिए ख़ुशी का सबब होगा।
एक बात और लिखना चाहूँगी कि गालियाँ देने का अधिकार भी शायद पुरुष अपने पास ही रखना चाहते हैं। जब कोई लडकी लड़कों को उन्हीं की जुबान में मोटी-मोटी गालियों में जवाब देती है, तो वह लोगों की नज़रों में बद्तमीज बदचलन,और न जाने क्या-क्या बन जाती है।