Sunday, August 24, 2008
बारह साल के साकी
मैं शराब नहीं पीता लेकिन शराब को जहर भी नहीं मानता। पीने-पिलाने वालों की सोहबत मुझे अच्छी लगती है। मेरे साथ बैठता हूं। सलाद वगैरह बनाने में मदद करता हूं और कोल्ड डि्क का गिलास हाथों में लेकर उनका साथ भी देता हूं। लेकिन इसके बावजूद मेरा मानना है कि यह ऐसी चीज भी नहीं है कि इसके बिना जिंदगी अधूरी हो। खासतौर पर बच्चों को तो इससे दूर ही रखा जाना चाहिए। लेकिन बस से लखनउ जाते समय समय मैंने साहिबाबाद बस अडडे में एक बच्चे को बीयर बेचते हुए भी देखा था। वैशाली में जहां मैं रहता हूं मैंने बच्चों को ही साकी की भूमिका निभाते हुए देखा है। शाम ढलते ही लोग माडल मधुशाला के किनारे अपनी गाडियां खडी कर देते हैं। दस बारह साल के बच्चे उनकी गाडियों को घेर लेते है। फिर एसी गाडियों में बैठे-बैठे ही बच्चों से मनपसंद डिंक की बोतल मंगाई जाती है। कार में मधुर संगीत के साथ शराब का आनंद उठाने के बाद लोग बच्चों को टिप और खाली बोतलें थमा कर घर वापस लौट जाते हैं। आप राहत महसूस कर सकते हैं ये हमारे घरों के बच्चे नहीं होते। ये वे बच्चे हैं जिनहें स्ट्रीट चाइल्ड कह कर हम ध्यान ही नहीं देते। पर यह राहत की बात नहीं। आप माने न माने ये बच्चे भी हमारे ही समाज का हिस्सा हैं। अगर हम इन बच्चों को स्कूल नहीं भेज सकते इनके खाने-पीने का इंतजाम नहीं कर सकते तो इनके हाथों में बोतल थमाने का हक हमें किसने दिया है।
Monday, August 11, 2008
बनाते हैं चैनल वाले
कुछ दिन हुए सैलून में कटिंग करा रहा था। मेरे खतों को ठीक करने के लिए नाई ने अपनी आंखें मेरे गरदन पर टिका रखी थी। उसने एक हाथ से मेरे सिर को जोर से पकड रखा था ताकि मैं अपना सिर हिलाकर उसके काम में बाधा न पहुंचा सकूं। सिर झुकाए हुए मैं सैलून में रखे टीवी की आवाज भर सुन पा रहा था। न्यूज चैनल पर एलियंस के बारे में कोई प्रोग्राम आ रहा था। एंकर ने चीखते हुए कहा- घर से निकलने से पहले एक बार आसमान की ओर जरूर देख लें। वह शायद आसमान से उतरने वाले किसी खतरे के बारे में आगाह कर रहा था। एंकर की इस आवाज के साथ ही मेरे कानों को एक दूसरी आवाज भी सुनाई दी- साले चूतिया बनाते हैं। यह मेरे नाई की आवाज थी। मैंने कहा जब चूतिया बनाते हैं तो चैनल देखते ही जरूर क्यों हो मैंने पूछा। उसने कहा रशीद भाई के अलावा कोई नहीं देखता। रशीद भाई दुकान के मालिक होंगे। इसलिए वह जो देखेंगे बेचारों को देखना पडता होगा। आज अखबार में पढा प्रोफ़ेसर यशपाल कह रहे थे कि न्यूज चैनलों पर दूसरी दुनिया और एलियंस आदि के बारे में बेसिर पैर की बातें दिखाई जाती हैं मैंने तो इस तरह के डिसकशन में जाना ही छोड दिया है। यशपाल अगर लेमैन की भाषा में बोलते तो ठीक वही कह रहे होते जो उस नाई ने कहा था। जाहिर है अब न्यूज चैनलों के प्रोग्राम के बारे में नाई और वैज्ञानिक की राय एक जैसी है। कुछ दिन बाद रशीद भाई जैसे लोग भी इन चमत्कारिक कहानियों से उब ही जाएंगे। शायद तब यह मजाक बंद हो लेकिन तबतकमीडिया की छवि पर पर जो बटटा लग चुका होगा उसकी भरपाई कैसे होगी।
Saturday, April 26, 2008
उगते हुए सूरज को आखिरी बार कब देखा था
फूल तो आप को भी अचछे लगते होंगे। गेंदा गुलाब जूही चंपा चमेली कमल ---दिमाग पर जोर डालें तो शायद कुछ नाम और याद आ जाएं। इनमें से किसी फूल को डाली पर झूमते हुए आखिरी बार कब देखा था आपने।फूलों को छोड़िए चिड़ियों की बातें करते हैं- कौवा कबूतर गौरैया बाज तोता मैना थोड़ी कोशिश करें तो कुछ नाम और याद आ सकते हैं पर यह तो बताइए कि इनमें से किसी पंछी की आवाज आखिरी बार कब सुनी थी।अब यह मत कह दीजिएगा कि पेड़ों को पहचानना मुशिकल हो सकता है पर उनके नाम से तो परिचित ही हैं। चलिए देखते हैं कितने पेड़ों के नाम ले सकते हैं आप---- आम जामुन पीपल महुआ पीपल बरगद कटहल वाकई बहुत से नाम जानते हैं आप पर यह तो बताइए किसी पेड़ की छांव में बैठ कर आखिरी बार कब सुसताए थे आप।जरा जोर डालिए दिमाग पर और बताइएउगते सूरज को आखिरी बार कब देखा थारात में चांद देखने की फुरसत कब मिली थी आपकोधरती को कब छुआ था आखिरी बारनदी या पोखर में कब लगाई थी डुबकी
धरती से खतम होते जा रहे हैं पेड पौधे नदी तालाब यह कभी सोचा ----तब तो कम से कम एक पेड़ जरूर लगाया होगा आपने
धरती से खतम होते जा रहे हैं पेड पौधे नदी तालाब यह कभी सोचा ----तब तो कम से कम एक पेड़ जरूर लगाया होगा आपने
Sunday, April 6, 2008
ढलती शाम चाय की चुस्कियां और अरुण आदित्य की कविताएं
कल एक बार फिर नील पदम-१ में दोस्तो का जमावड़ा हुआ। एक सप्ताह पहले ही सबसे खुद को खाली रखने का आग्रह कर चुका था। पर क्या करें महानगर की विडंबना है कि छुटटी में भी छुटटी मुश्किल से ही मिल पाती है। इसलिए हमेशा की तरह बहुत से लोगों ने आखिरी समय में माफी मांग ली। पर अपनी वैशाली में कविता लिखने और सुनने वालों की कमी नहीं सो कविता के कुछ रसिक जुट ही गए। ढलती शाम में चाय की चुस्कयों के साथ युवा कवि अरुण आदित्य ने अपनी नयी पुरानी ढेर सारी कविताएं सुनायीं। जन विकल्प में प्रकाशित अरुण जी की इन कविताओं का रसास्वादन आप भी करें-
मैंने तो बस इतना पूछा था
अंधकूप के अंधियारे में
दोपहर शाम कहां
यूकेलिप्टस के जंगल में
महुआ जामुन आम कहां
चाहे जितना सेज सजाओ
मेरे हिस्से काम कहां
राजा हो तुम राज करो जी
हमको है आराम कहां
कौन सिरफिरा पूछ रहा है
भइया नंदीगाम कहां
मैंने तो बस इतना पूछा
छांव कहां है घाम कहां
तुम्हें लगा मैं पूछ रहा हूं
राम कहां और वाम कहां
बापू क्यों शरमाए हैं
बापू तेरी जन्मभूमि पर
राम-राज हम लाए हैं
फिर भी तुम खुश नहीं
तुम्हारे माथे पर रेखाएं हैं
हिटलर भी था चुना हुआ
हम भी चुनकर आए हैं
हमने यह सच बोल दिया तो
बापू क्यों शरमाए हैं
ना कोई मरता ना ही
कोई सकता मार
बापू कैसे भूल गए तुम
गीता का यह सार
अगर याद है तो फिर काहे
चेहरा यूं लटकाए हैं
क्यों गिनते हैं मेरे खाते
में कितनी हत्याएं हैं
मैंने तो बस इतना पूछा था
अंधकूप के अंधियारे में
दोपहर शाम कहां
यूकेलिप्टस के जंगल में
महुआ जामुन आम कहां
चाहे जितना सेज सजाओ
मेरे हिस्से काम कहां
राजा हो तुम राज करो जी
हमको है आराम कहां
कौन सिरफिरा पूछ रहा है
भइया नंदीगाम कहां
मैंने तो बस इतना पूछा
छांव कहां है घाम कहां
तुम्हें लगा मैं पूछ रहा हूं
राम कहां और वाम कहां
बापू क्यों शरमाए हैं
बापू तेरी जन्मभूमि पर
राम-राज हम लाए हैं
फिर भी तुम खुश नहीं
तुम्हारे माथे पर रेखाएं हैं
हिटलर भी था चुना हुआ
हम भी चुनकर आए हैं
हमने यह सच बोल दिया तो
बापू क्यों शरमाए हैं
ना कोई मरता ना ही
कोई सकता मार
बापू कैसे भूल गए तुम
गीता का यह सार
अगर याद है तो फिर काहे
चेहरा यूं लटकाए हैं
क्यों गिनते हैं मेरे खाते
में कितनी हत्याएं हैं
Sunday, March 23, 2008
बहरों को सुनाने के लिए...
अत्याचारी ब्रिटिश सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा बम के साथ जो परचा फेंका गया था वह ब्रिटिश सरकार द्वारा किए जा रहे राष्ट्रीय दमन और अपमान की स्थिति का बयान तो करता ही है इन देशभक्तों की क्रान्ति विषयक अवधारणा के बारे में संकेत देता है। प्रस्तुत है पार्लियामेंट में फेंके गए परचे का हिंदी यह हिंदी अनुवाद
हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना
सूचना
बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज की जरूरत होती है प्रसिद्ध फ़्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियां के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं।
पिछले दस सालों में ब्रिटिश सरकार ने शासन सुधार के नाम पर इस देश का जो अपमान किया है उसकी कहानी दोहराने की आवशयकता नहीं है और न ही हिंदुस्तानी पार्लियामेंट पुकारे जाने वाली इस सभा ने भारतीय राष्ट्र के सिर पर पत्थर फेंककर उसका जो अपमान किया है उसके उदाहरणों को याद दिलाने की जरूरत है। यह सर्व विदित और स्पष्ट है। आज फिर जब लोग साइमन कमीशन से कुछ सुधारों के टुकडों की आशा में आंखें फैलाए हैं और इन टुकडों के लोभ में आपस में झगड रहे हैं विदेशी सरकार सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक और औद्यौगिक विवाद विधेयक के रूप में अपने दमन को और भी कडा करने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही आने वाले अधिवेशन में अखबारों द्वारा राजद्रोह रोकने का कानून जनता पर कसने की भी धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक काम करने वाले मजदूर नेताओं की अंधाधुंध गिरफतारियां यह स्पष्ट कर देती हैं कि सरकार किस रवैये पर चल रही है। राष्ट्रीय दमन और अपमान की इस उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व को गंभीरता से महसूस कर समाजवादी प्रजातंत्र संघ ने अपनी सेना को यह कदम उठाने की आज्ञा दी है। इस काम का प्रयोजन है कि कानून का यह प्रहसन समाप्त कर दिया जाए। विदेशी शोषक नौकरशाही जो चाहे करे परंतु उसकी वैधानिकता की नकाब फाड देना आवशयक है।
जनता के प्रतिनिधियों से हमारा अनुरोध है कि वे इस पार्लियामेंट के पाखंड को छोडकर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के खिलाफ क्रान्ति के लिए तैयार करें। हम विदेशी सरकार को यह बतला देना चाहते हैं कि हम सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक और औद्यौगिक विवाद विधेयक के दमनकारी कानूनों और लाला लाजपत राय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह कदम उठा रहे हैं।
हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं हम ऐसे उज्ज्वल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें हर व्यक्ति को पूरी शांति और स्वतंत्रता का अवसर मिल सके। हम इंसान का खून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परंतु क्रान्ति द्वारा सबको समान स्वतंत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त करने के लिए क्रान्ति में कुछ न कुछ रक्तपात जरूरी है।
इंकलाब जिंदाबाद हस्ताक्षर बलराज
कमांडर इन चीफ
साभारःराजकमल प्रकाशन
( ८ अप्रैल सन १९२९ को असेंबली में बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा फेंके गए परचे का हिंदी यह हिंदी अनुवाद राजकमल पेपर बैक्स द्वारा प्रकाशित पुस्तक भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज से ली गयी है।)
हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना
सूचना
बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज की जरूरत होती है प्रसिद्ध फ़्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियां के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं।
पिछले दस सालों में ब्रिटिश सरकार ने शासन सुधार के नाम पर इस देश का जो अपमान किया है उसकी कहानी दोहराने की आवशयकता नहीं है और न ही हिंदुस्तानी पार्लियामेंट पुकारे जाने वाली इस सभा ने भारतीय राष्ट्र के सिर पर पत्थर फेंककर उसका जो अपमान किया है उसके उदाहरणों को याद दिलाने की जरूरत है। यह सर्व विदित और स्पष्ट है। आज फिर जब लोग साइमन कमीशन से कुछ सुधारों के टुकडों की आशा में आंखें फैलाए हैं और इन टुकडों के लोभ में आपस में झगड रहे हैं विदेशी सरकार सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक और औद्यौगिक विवाद विधेयक के रूप में अपने दमन को और भी कडा करने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही आने वाले अधिवेशन में अखबारों द्वारा राजद्रोह रोकने का कानून जनता पर कसने की भी धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक काम करने वाले मजदूर नेताओं की अंधाधुंध गिरफतारियां यह स्पष्ट कर देती हैं कि सरकार किस रवैये पर चल रही है। राष्ट्रीय दमन और अपमान की इस उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व को गंभीरता से महसूस कर समाजवादी प्रजातंत्र संघ ने अपनी सेना को यह कदम उठाने की आज्ञा दी है। इस काम का प्रयोजन है कि कानून का यह प्रहसन समाप्त कर दिया जाए। विदेशी शोषक नौकरशाही जो चाहे करे परंतु उसकी वैधानिकता की नकाब फाड देना आवशयक है।
जनता के प्रतिनिधियों से हमारा अनुरोध है कि वे इस पार्लियामेंट के पाखंड को छोडकर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के खिलाफ क्रान्ति के लिए तैयार करें। हम विदेशी सरकार को यह बतला देना चाहते हैं कि हम सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक और औद्यौगिक विवाद विधेयक के दमनकारी कानूनों और लाला लाजपत राय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह कदम उठा रहे हैं।
हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं हम ऐसे उज्ज्वल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें हर व्यक्ति को पूरी शांति और स्वतंत्रता का अवसर मिल सके। हम इंसान का खून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परंतु क्रान्ति द्वारा सबको समान स्वतंत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त करने के लिए क्रान्ति में कुछ न कुछ रक्तपात जरूरी है।
इंकलाब जिंदाबाद हस्ताक्षर बलराज
कमांडर इन चीफ
साभारःराजकमल प्रकाशन
( ८ अप्रैल सन १९२९ को असेंबली में बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा फेंके गए परचे का हिंदी यह हिंदी अनुवाद राजकमल पेपर बैक्स द्वारा प्रकाशित पुस्तक भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज से ली गयी है।)
आन के दुआर क चिरई
शादी करके बीवी के साथ दिल्ली वापस आया तो जिंदगी कुछ बदली सी लगी। सुखद और सुविधाजनक। घर बिलकुल साफ-सुथरा चीजें सलीके से रखी हुईं। समय पर पानी चाय खाना। अटपटा सा लगता है इतना व्यवस्थित होना। इतने सलीके से रहने की अपनी आदत रही नहीं। जब चाहा खाया जहां गए वहीं सो रहे। मन किया तो शेविंग की या वैसे ही घूमते रहे। अब मेरी हर चीज पर किसी की नजर होती है। कई बार जो बातें मेरे लिए साधारण सी होती हैं वह पत्नी की नजर में महत्वपूर्ण। कई बार उसके साथ रहते या चलते हुए सोचता हूं वह मेरा इतना ध्यान क्यों रखती है जबकि साथ रहने के बावजूद कई बार वह मुझे अजनबी सी लगती है। क्या मैं उसे अजनबी जैसा नहीं लगता। जबकि शादी के बाद वह खुद भी बदल गई है। एक दिन उसने मुझसे कहा कि जब वह आईना देखती है कभी-कभी खुद को देखकर लगता है कि अरे यह कौन है। सिंदूर बिंदी और नथ ने उसका चेहरा ही बदल दिया है। उसने बताया कि शादी से पहले जब वह अपने गांव आयी थी तो लोगों के कहने पर उसे नाक छिदवाना पडा था।शादी के बाद भी तो बहुत कुछ बदला होगा उसकी जिंदगी में। पर वह अपनी खुशी से जयादा मेरी खुशी की चिंता करती है। और कभी-कभी खुद उदास नजर आती है। घर से दिल्ली आते समय मां ने हम दोनों को अलग-अलग बुलाकर कुछ बातें कहीं थीं। उससे क्या कहा मैं नहीं जानता लेकिन मुझे कहा कि- देखो इसे कभी डांटना मत। न तो इसके सामने किसी और पर गुससा होना। घर के कामों में मदद करना। अपने मां-बाप घर परिवार को छोडकर तुम्हारे साथ रहने आयी है इसको खुश रखना अब तुम्हारी जिममेदारी है। ई आन के दुआर क चिरई ह पोसात-पोसात पोसाई। मां की बातों पर अमल करने की कोशिश करता हूं। फिर भी वह कभी-कभी उदास हो जाती है। पूछता हूं क्या हुआ तो टाल जाती है पर उसकी आंखों की नमी सब कह जाती है। मां का कहना याद आ जाता है आन के दुआर क चिरई।
Monday, February 4, 2008
यह शूटरों का शहर नहीं है भाईसाब
आजमगढ़-२
बात-मुलाकात में किसी को पता चलता है कि मैं आजमगढ का रहने वाला हूं लोग बोल पडते हैं अरे अबू सलेम का आजमगढ़। चूंकि आजमगढ़ का हूं इसलिए यह पहचान बेचैन कर देती है। कोई आदमी यह तय करने की कोशिश कर सकता है कि उसकी पहचान कया हो लेकिन जगहें यह काम नहीं कर पातीं। वरना आजमगढ़ को कभी गवारा नहीं होता कि उसे अबू सलेम के नाम से जाना जाए। अगर किसी जगह को उनके रहने वालों के नाम से ही पहचाने की मजबूरी हो तो आजमगढ़ को अबू सलेम के नाम से नहीं अललामा शिबली नोमानी के नाम से पहचाना जाना चाहिए। हम आजमगढ़ को हिंदी खड़ी बोली का पहला महाकावय लिखने वाले अयोधया सिंह उपाधयाय हरिऔध- राहुल सांकृतयायन- कैफी और शबाना आजमी से लेकर हिंदी आलोचक मलयज आदि के नाम से कयों नहीं पहचानते। आजमगढ़ की पहचान उसकी उरदू पुसतकालय बलैक पाटरी या मुबारकपुर के उन हुनरमंद जुलाहों से कयों नहीं की जाती जो दुनियाभर में मशहूर बनारसी साडियां बनाने का काम करते हैं। आजमगढ़ की पहचान बताते समय पाकिसतान के जनरल रह चुके असलम बेग और टिनिडाड के परधानमंतरी और पेसिडेंट रहे कासिम उतीम के पुरखों को भी तो याद किया जा सकता है। आजमगढ़ की पहचान टीवी पर अंताछरी बनाकर मशहूर हुए गजेंदर सिंह फिलम डाइरेकटर राजेश सिंह और दुनियाभर में फैले वे तमाम लोगों कयों नहीं हो सकते जो गुमनाम ही सही पर मेहनत मजूरी करके ईमानदारी की रोजीरोटी कमा खा रहे हैं।अभी पिछले दिनों जब मैं आजमगढ़ आया तो एक पंदरह साल के बचचे को छोटी सी टू सीटर कार चलाते देखकर दंग रह गया। चंदन नाम के इस बचचे ने टाटा की नैनो आने से बहुत पहले ही अपनी कार फेम को आजमगढ़ की सड़कों पर उतार दिया था। उसने सकूटर के कल पुरजों को जोड़कर पचीस हजार कीमत वाली यह कार बनाई है जो एक लीटर में चालीस किलोमीटर की दूरी तय करती है। कया आपने चंदन का नाम सुना है।आप आजमगढ़ को चंदन के नाम से कयों नहीं पहचानते।
बात-मुलाकात में किसी को पता चलता है कि मैं आजमगढ का रहने वाला हूं लोग बोल पडते हैं अरे अबू सलेम का आजमगढ़। चूंकि आजमगढ़ का हूं इसलिए यह पहचान बेचैन कर देती है। कोई आदमी यह तय करने की कोशिश कर सकता है कि उसकी पहचान कया हो लेकिन जगहें यह काम नहीं कर पातीं। वरना आजमगढ़ को कभी गवारा नहीं होता कि उसे अबू सलेम के नाम से जाना जाए। अगर किसी जगह को उनके रहने वालों के नाम से ही पहचाने की मजबूरी हो तो आजमगढ़ को अबू सलेम के नाम से नहीं अललामा शिबली नोमानी के नाम से पहचाना जाना चाहिए। हम आजमगढ़ को हिंदी खड़ी बोली का पहला महाकावय लिखने वाले अयोधया सिंह उपाधयाय हरिऔध- राहुल सांकृतयायन- कैफी और शबाना आजमी से लेकर हिंदी आलोचक मलयज आदि के नाम से कयों नहीं पहचानते। आजमगढ़ की पहचान उसकी उरदू पुसतकालय बलैक पाटरी या मुबारकपुर के उन हुनरमंद जुलाहों से कयों नहीं की जाती जो दुनियाभर में मशहूर बनारसी साडियां बनाने का काम करते हैं। आजमगढ़ की पहचान बताते समय पाकिसतान के जनरल रह चुके असलम बेग और टिनिडाड के परधानमंतरी और पेसिडेंट रहे कासिम उतीम के पुरखों को भी तो याद किया जा सकता है। आजमगढ़ की पहचान टीवी पर अंताछरी बनाकर मशहूर हुए गजेंदर सिंह फिलम डाइरेकटर राजेश सिंह और दुनियाभर में फैले वे तमाम लोगों कयों नहीं हो सकते जो गुमनाम ही सही पर मेहनत मजूरी करके ईमानदारी की रोजीरोटी कमा खा रहे हैं।अभी पिछले दिनों जब मैं आजमगढ़ आया तो एक पंदरह साल के बचचे को छोटी सी टू सीटर कार चलाते देखकर दंग रह गया। चंदन नाम के इस बचचे ने टाटा की नैनो आने से बहुत पहले ही अपनी कार फेम को आजमगढ़ की सड़कों पर उतार दिया था। उसने सकूटर के कल पुरजों को जोड़कर पचीस हजार कीमत वाली यह कार बनाई है जो एक लीटर में चालीस किलोमीटर की दूरी तय करती है। कया आपने चंदन का नाम सुना है।आप आजमगढ़ को चंदन के नाम से कयों नहीं पहचानते।
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